सत्याग्रह, गांधीजी का आध्यात्मिक एवं नैतिक विचार

सत्याग्रह दो शब्दों से मिलकर बना है सत्य के लिए दृढ़ता पूर्वक आग्रह करना तथा निस्वार्थ भाव से निष्पक्ष होकर सभी प्रकार के कष्टों और कठिनाइयों की चिंता किए बिना अहिंसात्मक रूप से आचरण करना। 
                         पश्चिमी जठात में निष्क्रिय प्रतिरोध को असहाय एवं दुर्बल लोगों का अस्त्र माना जाता है दक्षिण अफ्रीका में प्रारंभिक दौर में गांधीजी निष्क्रिय प्रतिरोध को मानते थे लेकिन बाद में अपने अहिंसात्मक आंदोलन को एक उपयुक्त नाम देना चाहते थे इसके लिए उन्होंने अपने अखबार इंडियन ओपिनियन में पाठकों से सुझाव मांगा गांधी जी के भतीजे मगनलाल गांधी ने सदा ग्रह नाम सुझाया गांधीजी ने आवश्यक संशोधन कर इसे सत्याग्रह नाम दिया। 

- सत्याग्रह अन्याय का विरोध करने का नैतिक अस्त्र है। 
- सत्याग्रह का उद्देश्य विरोधी को तर्क सेवा व प्रेम द्वारा जीतना है। 
- गांधीजी ने व्यक्तिगत रूप से सत्याग्रह को सबसे बड़ा नैतिक शास्त्र माना है। 

 सत्याग्रह की कुछ प्रमुख तकनीकें निम्नलिखित हैं। 

असहयोग - अन्याय करने वाले का सहयोग ना करना। 

सविनय अवज्ञा - अनुचित लग रही बात या कानून को मानने से इंकार कर देना। 

हिजरत - स्थाई निवास से स्वेच्छा पूर्वक किसी अन्य स्थान पर चले जाना है हिजरत है 1928 और 29 में क्रमशः बारदोली और लिंबड़ी में अंग्रेज सरकार के शोषण के विरुद्ध और 1935 में कैथा स्वर्ण हिंदुओं के अत्याचार के विरुद्ध हरिजनों को हिजरत करने का गांधी जी ने सुझाव दिया था। 

उपवास - प्रयश्चित और आत्म शुद्धि तथा अन्याय करने वाले का आत्म परिवर्तन करने का साधन उपवास है गांधीजी ने इसे सबसे प्रभावशाली अस्त्र बताया है। 

हड़ताल - गांधीजी ने इसे सबसे अंतिम शस्त्र के रूप में चुना हड़ताल का उद्देश्य श्रमिकों के कष्टों को दूर करने तथा पूंजी पतियों में अधिक धन कमाने की लालसा को रोकना है। 

Posted on by