राजा राम मोहन राय के विषय में संक्षिप्त जानकारी

राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का जनक,  अतीत एवं भविष्य के मध्य सेतु, आधुनिक भारत का पिता, पत्रकारिता का पिता तथा भारत का प्रथम आधुनिक व्यक्ति आदि की संज्ञा दी जाती है। 

सुभाष चंद्र बोस राजा राममोहन राय को युग दूत कहते थे। 

लंदन से शिक्षा प्राप्त कर लौटने के पश्चात 1797 में Thomos wood ford तथा बाद में Digby के अधीन दीवान के रूप में इन्होंने कार्य किया इनका प्रमुख उद्देश्य एकेश्वरवाद की स्थापना करना तथा हिंदू धर्म में फैली कुरीतियों को दूर करना था। 

राजा राममोहन राय ने 1809 में तुहाफात-उल-मुवाहीदीन दिन नामक पुस्तक की रचना की जो कि इस्लाम धर्म पर आधारित थी। 

1820 में द परसेप्टस ऑफ जीसस नामक पुस्तक इंग्लिश में लिखी जिसका प्रकाशन लंदन के डिग्बी के सहयोग से हुआ था। 

1820 में ब्रह्ममिकल मैगजीन निकाला। 1821 में निशतुल अखबार पारसी में तथा संवाद कौमुदी बंगाली भाषा में ।

इन्होंने 1815 में आत्मीय सभा की स्थापना की थी जिसका मुख्य उद्देश्य एकेश्वरवाद का प्रचार करना था। 

1817 में डेविड हेयर की सहायता से कोलकाता में हिंदू कॉलेज की स्थापना की थी। 

1825 में कोलकाता में ही वेदांत कॉलेज की स्थापना की जिसमें भारतीय एवं पश्चिमी सामाजिक एवं भौतिक विज्ञान की पढ़ाई होती थी। 

1827 में जूरी एक्ट का विरोध किया जिसमें धार्मिक आधार पर हिंदू मुसलमानों से डिबेट किया था यह पहले भारतीय थे जिन्होंने समुद्र पार ब्रिटेन के समक्ष भारतीयों के मांग को रखा इन्होंने मद्रास के विद्वान सुब्रमण्यम शास्त्री को मूर्ति पूजा के प्रश्न पर पराजित किया था। 

1828 में इन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की जिसका उद्देश्य एकेश्वरवाद का प्रचार करना था ब्रह्म समाज में राजा राम मोहन राय अध्यक्ष के रूप में और इनके साथ द्वारिका नाथ टैगोर , देवेंद्र नाथ टैगोर तथा केशव चंद्र सेन थे। 

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