राजपाल को अपने राज्य के शासन तंत्र को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं। राज्यपाल को स्वविवेक के आधार पर प्रयुक्त शक्तियाँ भी प्राप्त है। विधानसभा में किसी भी दल का स्पष्ट बहुमत न होने पर तथा संविधान की विफलता की स्थिति में भी उसे स्वविवेक ही अधिकार प्राप्त है इसी स्थिति में वह अपनी वास्तविक शक्ति का उपयोग करता है। संकट काल की स्थिति में केंद्रीय सरकार के अभिकर्ता के रूप में कार्य करता है। इस स्थिति में वह अपनी वास्तविक स्थिति का प्रयोग कर सकता है।
* इस पर भी वह केवल वैधानिक अध्यक्ष ही होता है। वास्तविक कार्यपालिका शक्तियां तो राज्य की मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं। राजपाल बाध्य है की वह मंत्रिपरिषद की सलाह से ही कार्य करे। जब तक राज्यपाल मंत्री परिषद के परामर्श से कार्य करता है और विधानमंडल के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदाई मंत्रिमंडल को शासन कार्य में सहायता तथा परामर्श देता है तब तक उनके लिए राज्यपाल के परामर्श की अवहेलना करने की बहुमत की कम संभावना है। महाराष्ट्र के भूतपूर्व राज्यपाल स्वर्गीय श्री प्रकाश ने कहा था कि "मुझे पूरा विश्वास है कि मैं संवैधानिक राज्यपाल के अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं करना होगा।" इस प्रकार राज्यपाल का पद शक्ति व अधिकार का नहीं वरन सम्मान व प्रतिष्ठा का है।