सबसे विख्यात केंद्र नालंदा महाविहार था जहां बौद्ध भिक्षुओं को शिक्षित करने के लिए एक बड़ा विश्वविद्यालय था ऐसा कहा गया कि इस महाविहार में 10000 छात्र थे जिसमें सभी बौद्ध भिक्षु थे उन्हें महायान संप्रदाय का बौद्ध दर्शन पढ़ाया जाता था ।
एक अन्य चीनी यात्री इत्सिंग 670ई में नालंदा आया और उसके अनुसार इस महाविद्यालय में केवल तीन हजार भिछु रहते थे ।
ह्वेनसांग के अनुसार नालन्दा विश्वविद्यालय का भरण पोषण 100 गांव के राजस्व से होता था।इतसिंग ने इस संख्या को बढ़ाकर 200 कर दिया जाए और हर्ष की धार्मिक नीति सहनशील थी ।वह आरंभिक जीवन में शैव था ।परंतु धीरे-धीरे बहुत प्रभाव से उसने महायान के सिद्धांतों के प्रचार के लिए कन्नौज में एक विशाल महासम्मेलन का का आयोजन किया ।सम्मेलन में शास्त्रार्थ का आरंभ ह्वेनसांग ने किया ।कन्नौज के बाद उसने प्रयाग में महासम्मेलन बुलाया जहां हर्ष ने अपने शरीर के वस्त्रों को छोड़कर सभी वस्तुओं को दान कर दिया।
बाणभट्ट ने अपनी आश्रय दाता के आरंभिक जीवन का चाटुकारिता पूर्ण चरित्र चित्रण हर्षचरित नामक पुस्तक में किया हर्ष को तीन नाटकों प्रियदर्शिका रत्नावली और नागानंद के रचयिता के रूप में भी जाना जाता है।
हेनसांग के प्रभाव में आकर हर्ष बौद्ध धर्म का महान समर्थक होगा और और उक्त चीनी विवरण से ज्ञात होता है कि उस समय पाटलिपुत्र वैशाली पतन की अवस्था में थी इस प्रकार बौद्ध धर्म और नालंदा का वर्णन मिलता है।