कुषाण साम्राज्य ने विभिन्न शैलियों के प्रशिक्षित राज्य मिस्त्रीओं और अन्य कारीगरों को एकत्र किया और इससे कला की नई शैलियां विकसित हुए जैसे गांधार और मथुरा शैली।
मथुरा कला के सर्वप्रथम संरक्षक कुषाण थे जबकि गांधार कला के संरक्षक शक और कुशान दोनों थे ।
गांधार कला यथार्थवादी जबकि मथुरा कला आदर्शवादी है भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत कंधार का मध्य एशियाई और रोमन शिल्पकारओं साथ संपर्क हुआ ।
इससे मूर्ति कला की नई शैली का उदय हुआ जिसमें बुद्ध की प्रतिमाएं भारत और रोम की मिश्रित शैली में बनाई गई बुद्ध के बाल यूनान रोमन कला शैली में बनाए गए ।
गांधार कला का प्रभाव भारत मथुरा में भी पहुंचा । जबकि यह मूलतः देशी कला केंद्र था।
मथुरा में बुद्धि अद्भुत प्रतिमा बनी इस जगह की मूर्ति ख्याति कनिष्क को लेकर भी है जिसका नाम है सिरोहीन की खड़ी मूर्ति । जिस के निचले भाग में कनिष्क का नाम उत्कीर्ण है।
मूर्तिकला की मथुरा शैली आरंभिक सदियों में विकसित हुई तथा इसकी लाल बलुआ पत्थर की मूर्तियां मथुरा के बाहर भी प्राप्त होती हैं महाराष्ट्र में चट्टानों को काटकर बनाई गईं।
इस प्रकार बौद्ध धर्म से संबंधित चित्र गया सांचा और भारत में पाए जाते हैं जो ईसा पूर्व दूसरी सदी के हैं ।
आंध्र प्रदेश में नागार्जुनकोंडा और अमरावती बौद्ध कला के महान केंद्र हो गए जहां बुद्ध के जीवन की अनेक कथाएं पट्टों पर चित्रित की गई हैं।