१- वर्साय की संधि:- वास्तव में द्वितीय विश्वयुद्ध वर्साय की संधि का परिणाम था। वर्साय की संधि ने यूरोप में प्रतिशोध का जो बीज बोया वह कालांतर में द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में प्रस्फुटित हुआ। प्रथम विश्व युद्ध के बाद विजेता मित्र राष्ट्रों ने वर्साय की संधि का कड़वा घूंट पीने के लिए जर्मनी को बाध्य कर दिया। इस अन्यायपूर्ण संधि के द्वारा जर्मनी की न केवल सैन्य शक्ति को क्षीण कर दिया गया बल्कि उसके विशाल साम्राज्य को भी विघटित कर दिया गया। जर्मनी के औद्योगिक एवं खनिज संपदा वाले क्षेत्रों पर बलात् अधिकार कर लिया गया।पेरिस शांति सम्मेलन में जर्मन प्रतिनिधियों को अपमानित किया गया, तथा युद्ध की क्षतिपूर्ति के लिए भारी हर्जाना थोप दिया गया। मित्र राष्ट्रों में इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका तथा रूस आदि देश सम्मिलित थे।
कालांतर में हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने वर्साय की संधि को न केवल अस्वीकार कर दिया बल्कि अपने अपमान का बदला लेने के लिए उसने द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ कर दिया।
२-इटली ऑस्ट्रिया और तुर्की का असंतोष:- इटली भी वर्साय की संधि से पूरी तरह संतुष्ट न था। मित्र राष्ट्रों ने प्रथम विश्व युद्ध के समय इटली को जो वचन दिए थे उन्हें शांति सम्मेलन में पूरा नहीं किया गया। फलत: इटली भी फ्रांस और इंग्लैंड से बदला लेने के अवसर की तलाश में था। इटली में फासिज्म का उदय एवं विकास का मुख्य आधार वर्साय की संधि ही थी। इटली के साथ- साथ ऑस्ट्रिया और तुर्की भी वर्साय की संधि से असंतुष्ट थे। मित्र राष्ट्रों ने टर्की के साथ सेवरीज की संधि करके उसके अधिकांश क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। टर्की ने इस संधि का खुलकर विरोध किया और कमाल पाशा के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। पेरिस सम्मेलन की यह संधि भी अस्थाई सिद्ध हुई। इन संधियों ने यूरोप में असंतोष तथा क्षोभ का वातावरण उत्पन्न कर दिया। परिणाम स्वरूप मित्र राष्ट्रों द्वारा की गई संधियां द्वितीय विश्व युद्ध का कारण बनी।