125 वां संविधान संशोधन विधेयक

भारत सरकार के द्वारा राज्यसभा में 125 वां संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया है जिसका मुख्य उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत में छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों में कार्यरत 10 स्वायत्त परिषदों की वित्तीय और कार्यकारी शक्तियों को बढ़ावा देना है। 125 वें संविधान संशोधन का मुख्य प्रभाव असम मेघालय त्रिपुरा और मिजोरम में रहने वाले एक करोड़ जनजाति लोगों पर पड़ेगा। 

महत्वपूर्ण बिंदु

इस विधेयक में चुनावी ग्रामीण परिषदों का प्रावधान किया गया है जिससे कि प्रजातंत्र को निचले से निचले स्तर तक लागू किया जा सके। 

इसके अंतर्गत ग्रामीण परिषदें अब आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय के लिए इन विषयों से संबंधित योजनाएं का निर्माण कर सकती हैं जो निम्नलिखित हैं-
-कृषि भूमि का उत्क्रमण
-भूमि सुधार का कार्यान्वयन
-लघु सिंचाई जल प्रबंधन
-पशुपालन
-ग्रामीण विद्युतीकरण
-लघु उद्योग एवं सामाजिक वानिकी 

इस संशोधन के अनुसार वित्त आयोग इन ग्रामीण परिषदों के लिए वित्तीय आवंटन की अनुशंसा करेगा और ग्रामीण एवं शहरी परिषदों में कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएगी। 

संविधान की छठी अनुसूची

छठी अनुसूची के अंतर्गत असम , मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के जनजाति क्षेत्रों में स्वायत्तशासी जिलों का गठन किया गया है लेकिन यह स्वायत्तशासी क्षेत्र राज्य के कार्यकारी प्राधिकार से बाहर नहीं रखे गए हैं। और राज्यपाल को 87 जिलों को स्थापित या पुनर्स्थापित करने का अधिकार प्रदान किया गया है जिसका प्रयोग करके राज्यपाल स्वशासी क्षेत्र की सीमा को घटा भी सकता है तथा बड़ा भी सकता है और तथा आवश्यकता पड़ने पर नाम भी परिवर्तित कर सकता है । और यदि स्वशासी जिले में विभिन्न जनजातियां हैं तो राज्यपाल जिले को विभिन्न स्वशासी क्षेत्रों में विभाजित भी कर सकता है। 

प्रत्येक स्वशासी जिले के लिए एक जिला परिषद होगी जिसमें 30 सदस्य होंगे जिनमें से 26 सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाएगा तथा अन्य 4 सदस्यों को राज्यपाल के द्वारा मनोनीत किया जाएगा राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाने वाले सदस्य राज्यपाल के प्रसाद पर्यंत तक बने रहेंगे लेकिन 26 सदस्य जो व्यस्क मताधिकार के द्वारा चुने जाएंगे उनका कार्यकाल 5 वर्ष का निर्धारित होगा। 

जिला व प्रादेशिक परिषद ने अपने अधीन क्षेत्रों में जनजातियों के आपसी मामलों के निपटारे के लिए ग्राम परिषद या न्यायालय का गठन कर सकती हैं तथा की गई अपीलों की सुनवाई भी कर सकती हैं और राज्यपाल के द्वारा इन मामलों में उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को निर्धारित किया जाता है। 

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