आधुनिक भारत का इतिहास,Chap-4, इंगलिश ईस्ट इन्डिया कम्पनी और मैसूर,Day-3

तृतीय आंग्ल-मैसूर युध्द 

* यह युध्द 1790-92 ई० के बीच लड़ा गया। इस युध्द के समय बंगाल का गवर्नर लॉर्ड कार्नवालिस (1786-93 ई०) जबकि भारत का मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय था। 

* इस युध्द का कारण अंग्रेजों द्वारा टीपू पर यह आरोप लगाया जाना था, कि वह अंग्रेजों के विरुध्द फ्रांसीसीओं से संबंध स्थापित कर रहा है। 

*अंग्रेजों ने इस युध्द की शुरुआत मद्रास के गवर्नर मिडोज के नेतृत्व में की थी, जिसमें मिडोज बुरी तरह से पराजित हुआ। तब कार्नवालिस ने स्वयं कमान सम्भाल ली। 

* उसे भी टीपू सुल्तान ने जबरदस्त चुनौती दी, परन्तु फरवरी 1792 ई० को टीपू के श्रीरंगपट्टनम् किले का घेरा लॉर्ड कार्नवालिस ने डाला और अंतत: 1792 ई० में टीपू के साथ अंग्रेजों ने श्रीरंगपट्टनम् की सन्धि की।

सन्धि के अनुसार - 

1- टीपू को अपने मैसूर राज्य का आधा हिस्सा अंग्रेजों को देना पड़ा। 

2- युध्द की क्षतिपूर्ति के रूप में टीपू को 3.3 करोड़ रुपये देने थे और उसकी अदायगी भी एक साल के भीतर की जानी थी। 

* श्रीरंगपट्टनम् की सन्धि के बाद लॉर्ड कार्नवालिस ने कहा था, " हमने अपने मित्रों को शक्तिशाली किये बगैर अपने शत्रु को कुचल दिया। 

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युध्द 

यह युध्द 1799 ई० में हुआ था। इस युध्द के समय भी भारत का मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय था, जबकि बंगाल का गवर्नर लॉर्ड वेलेज्ली ( 1798-1805 ई० ) था। 

* इस युध्द का कारण भी टीपू पर अंग्रेजों द्वारा यह आरोप लगाया जाना था, कि वह फ्रांसीसीओं के साथ संम्पर्क स्थापित कर रहा था।

* 1792 ई० के श्रीरंगपट्टनम् की सन्धि में विदेशी ताकतों से अच्छे संम्बन्ध रखने के बारे में टीपू पर कोई पाबन्दी नहीं लगाई गई थी। वास्तव में टीपू को अंग्रेज अब जड़ से ही समाप्त कर देना चाहते थे। 

इस युध्द के पूर्व टीपू ने बाह्य शक्तियों से सहयोग प्राप्त करने की कोशिश की थी। उसने फ्रांसीसीओं द्वारा स्थापित जैकोबिन क्लब ( फ्रांसीसी क्रान्ति का प्रतीक ) की सदस्यता भी ग्रहण की। उसने श्रीरंगपट्टनम् में फ्रांसीसी क्रान्ति के उपलक्ष्य में स्वतंत्रता का वृक्ष लगाया था। 

* फरवरी 1799 ई० में मैसूर के विरुध्द अंग्रेजों ने युध्द की घोषणा कर दी। यद्यपि टीपू ने बहादुरीपूर्वक इसका मुकाबला किया, अन्तत: उसकी पराजय हुई।

4 मई, 1799 ई० को टीपू सुल्तान श्रीरंगपट्टनम् के किले के नजदीक युध्द करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। 

* वह कहा करता था- सौ दिन गीदड़ का भाँति जीने से अच्छा है, एक दिन शेर की तरह जीना ।

अंग्रेजों ने एक बार फिर से मैसूर में वोडियार वंश की स्थापना करते हुए, कृष्ण राज को गद्दी पर बैठाया और साथ ही सहायक सन्धि कर ली।

* टीपू श्रंगेरी के जगद्गुरु शंकराचार्य श्री सच्चिदानन्द भारती का बहुत अधिक आदर करता था। 

* श्रीरंगपट्टनम् ने 9 मील की दूरी पर वह प्रसिध्द आधुनिक बाँध है जो कृष्णराज सागर नाम का विशाल जलाशय बनाने के लिए बनवाया गया था। यहाँ से प्राप्त एक अभिलेख के अनुसार इसका निर्माण टीपू सुल्तान ने कराया था।

* टीपू ने पहली बार मैसूर में रेशम के उत्पादन का कार्य आरम्भ किया, जोकि आगे चलकर एक सफल उद्योग के रूप में विकसित हुआ। शहतूत के पेड़ लगाने का काम खास-खास किसानों को सौंपा गया।

* टीपू ने आधुनिक तरीकों से कागज बनाने के कार्य में भी सफलता हासिल की। वह घड़ियों व छुरी काँटों के उत्पादन में भी कामयाब रहा। 

                     अद्य्द्याय समाप्त                       

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