अंग्रेजी कुशासन का भारत के सभी वर्गों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा । ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में दो प्रमुख कार्य थे- साम्राज्य बढ़ाना और भारत की व्यापारिक और आर्थिक शोषण करना। अंग्रेजों की धन लोलुपता की कोई सीमा नहीं थी।ब्रिटिश शासकों की अत्याचार एवं दमनकारी नीति के विरुद्ध भारतीयों का रोज समय समय पर भारत के भिन्न-भिन्न भागों में सैनिक संघर्ष अथवा जन विद्रोह के रूप में प्रकट होता रहा था। यह सभी संघर्ष अनेक राजनीतिक आर्थिक और प्रशासनिक कारणों से हुए थे।इसी तरह विद्रोह की ज्वाला 1857 ईसवी में धधक उठी जिसने अंग्रेजी साम्राज्य कीचड़ तक को हिला दिया। इसीलिए इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा गया।
1857 ई. की क्रांति का स्वरूप-
निसंदेह 1857 ई. का संघर्ष भारतीय इतिहास की एक अभूतपूर्व युगांतकारी घटना है। इस क्रांति के स्वरूप के विषय में मुख्य रूप से दो भिन्न मत हैं-अंग्रेजों ने जो साम्राज्यवाद के स्वाभाविक पक्षपाती थे इसे केवल सैनिकों के संघर्ष की संज्ञा दी,
जबकि भारतीयों ने इसे निर्विवाद रूप से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और प्रथम राष्ट्रीय आंदोलन बताया।
सर जॉन लॉरेंस के अनुसार- यह एक सैनिक क्रांति थी।
सर जेम्स आउटरम के अनुसार- यह एक मुस्लिम षड्यंत्र था क्योंकि भारतीय मुसलमानों ने दिल्ली के बहादुर शाह के नेतृत्व में अंग्रेजों को भारत से निकाल कर पुनः देश पर अपनी सत्ता स्थापित करने का सशस्त्र प्रयत्न किया था।
वीर सावरकर के अनुसार-यह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था।
अशोक मेहता के अनुसार- यह भारत का प्रथम राष्ट्रीय आंदोलन था।
मिस कर सकता अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 ई. का स्वतंत्रता संग्राम भारतीयों का प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम ही था , जो सैनिक क्रांति के माध्यम से प्रारंभ हुआ था । इसका वास्तविक स्वरूप कुछ भी क्यों ना हो शीघ्र ही यह भारत में अंग्रेजी सत्ता के लिए एक चुनौती का प्रतीक बन गया।