५- क्रांति में एकता का अभाव:- 1857 ईसवी की क्रांति का स्वरूप मुख्यतः सामंतवादी था । एक तरफ अवध रोहिलखंड तथा उत्तरी भारत के सामंतवादी तत्वों ने क्रांति का समर्थन और नेतृत्व किया तो दूसरी ओर पटियाला, ग्वालियर, हैदराबाद के शासकों ने इस क्रांति के दमन में सहायता प्रदान की।
6-नौसैनिक शक्ति का अभाव:- भारतीय क्रांतिकारियों के पास कोई नौसैनिक शक्ति नहीं थी।फलत: वे समुद्री मार्ग द्वारा इंग्लैंड से आ रही युद्ध सामग्री व अंग्रेजी सेना को भारत में आने से रोक ना सके।इस प्रकार अंग्रेजों ने ब्रिटिश साम्राज्य के भिन्न-भिन्न भागों से अधिक संख्या में सैनिक बुलाकर भारत में एकत्र कर लिए।
७-अंग्रेजों के पास अच्छी संचार व्यवस्था:- अंग्रेजों की सफलता का मुख्य कारण उनकी विद्युत तार व्यवस्था थी।अंग्रेज अपनी इस संचार व्यवस्था के माध्यम से क्रांतिकारियों की गतिविधियों से सदैव अवगत रहे। किस भारतीय क्रांतिकारी अंग्रेजों की इस व्यवस्था को नष्ट कर देते तो क्रांति के परिणाम अवश्य ही कुछ और होते ।
८- निश्चित उद्देश्य का अभाव:- प्रारंभ में क्रांतिकारियों का एक सामान्य लक्ष्य था की बहादुर शाह द्वितीय को भारत की गद्दी पर बैठाया जाए किंतु जब अंग्रेजों ने बहादुरशाह को बंदी बना लिया तो क्रांतिकारियों का यह लक्ष्य समाप्त हो गया।अब क्रांतिकारियों के सम्मुख विदेशी विरोध भावना के अतिरिक्त कोई अन्य सामान्य उद्देश्य नहीं रह गया। अब अंग्रेजों ने परिस्थिति का लाभ उठाकर हिंदुओं और मुसलमानों में फूट डालने का प्रयास किया। इससे भी क्रांति को निर्बल होना पड़ा।
९- कुछ लोगों का असहयोग:- किसानों और छोटी जाति के लोगों ने क्रांति के प्रति कोई सक्रिय सहानुभूति नहीं दिखाई।बंबई और मद्रास में भर्ती किए गए सैनिक प्राय: छोटी जातियों के थे और वे राज-भक्त बने रहें।
१०- सफल नेतृत्व का अभाव:- क्रांतिकारियों के पास कोई कुशल तथा अनुभवी नेता नहीं था।नाना साहब, रानी लक्ष्मीबाई , तात्या टोपे, कुंवर सिंह सभी अपने-अपने ढंग से संघर्ष कर रहे थे।
इस प्रकार प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन असफल सिद्ध हुआ।