वैज्ञानिकों के एक दल ने अपने शोध् से पाया है कि ग्रीनलैण्ड की बर्फ बहुत तीव्र गति से पिघल रही है जिसके कारण ग्रीनलैण्ड के चारों ओर समुद्री जल के खारेपन में कमी आ रही है।
वैज्ञानिकों के अनुसार ग्रीनलैण्ड की बर्फ वर्ष 1983 से 2003 के बीच जिस गति से पिघल रही थी उसकी लगभग दो गुनी गति से वर्तमान समय में पिघल रही हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2003 से ग्रीनलैण्ड के पूर्वोत्तर हिस्से में ‘ग्रीनलैण्ड इकोसिस्टम मॉनीटरिंग प्रोग्राम’ (Greenland Ecosystem Monitoring Programme) के नाम से वार्षिक अध्ययन प्रारम्भ हुआ। इस वार्षिक अध्ययन से ग्रीनलैण्ड के तेजी से पिघलने एवं उसके परिणामस्वरूप समुद्री जल के खारेपन में कमी के प्रमाण प्राप्त हुए।
ग्रीनलैण्ड की बर्फ के पिघलने का प्रमुख प्रभाव
- ग्रीनलैण्ड की बर्फ के पिघलने से समुद्री जल के खारेपन में कमी आ रही है जिससे समुद्री पारिस्थितकी तंत्र में बदलाव आ सकता है।
- बर्फ के पिघलने से समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है जिससे नजदीकी द्वीपों पर नकारात्क प्रभाव पड़ेगा।
- बर्फ के पिघलने से यूरोप को गर्म रखने वाली महासागरीय धराओं में परिवर्तन आ सकता है।
- सबसे बढ़कर इससे यूरोप को गर्म रखने वाली गल्पफ स्ट्रीम धरा के थर्मोहेलाइन परिसंचरण के पैटर्न में भी परिवर्तन आ सकता है जिससे आने वाले समय में व्यापक स्तर पर मौसमी परिवर्तन देखने को मिल सकता है।
अंटार्कटिका में बर्फ की चट्टान टूटने की घटना
- कुछ समय पूर्व अंटार्कटिका की बर्फ की सबसे बड़ी चट्टानों में से एक ‘लार्सन सी’ चट्टान से 5000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्राफल से अधिक का टुकड़ा टूटकर अलग हो गया। ज्ञातव्य है कि ‘लार्सन सी’ का क्षेत्रफल 46,500 वर्ग किलोमीटर है।
- इसी प्रकार अंटार्कटिका की कई अन्य चट्टानों में बड़ी दरार देखी गयी है जो भविष्य में इनके टूटने का प्रमुख कारण बन सकती है।
अंटार्कटिका के बर्फ की चट्टान के टूटने का प्रभाव
- भारत के द्वारा अंटार्कटिका में वैज्ञानिक अध्ययन के लिए दाक्षिण गंगोत्री, मैत्री एवं भारती नामक अनुसंधन केन्द्र स्थापित किये गये हैं जो अंटार्कटिका के बर्फ के पिघलने आदि के प्रभाव का अध्ययन करने में संलग्न है।
- विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि अंटार्कटिका के बर्फ के पिघलने से समुद्र के जल स्तर में वृद्धिहो रही है।
- इसी प्रकार इससे महासागरीय धराओं एवं भूमध्यरेखीय पवनों के परिसंचरण में बदलाव आने की संभावना व्यक्त की गयी है।
- सबसे बढ़कर इससे समुद्री पारिस्थितकी एवं जैव विविधता के गंभीर रूप से प्रभावित होने की संभावना बढ़ गयी है।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव से पृथ्वी के उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों छोरों पर बर्फ के पिघलने की दर बढ़ रही है। यदि समय रहते इन पर नियंत्राण नहीं किया गया तो विश्व के सभी देशों को इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।