राजनीतिक दलों को प्राप्त होने वाले चंदें पर हमेशा से पारदर्शिता का सवाल उठता रहा है। दरअसल राजनीतिक दलों की मंशा कभी भी इस मामले में स्पष्ट नहीं रही है। यही कारण है कि देश में चुनावों के दौरान भारी मात्रा में काले धल को खपाया जाता है तथा भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जाता है। ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिपफार्म्स’ (ADR) नामक संस्था ने 2004-05 से 2014-15 के बीच राजनीतिक पार्टियों को मिले चंदे के बारे में इस साल रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट के अनुसार 7 राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में सबसे अधिक चंदा कांग्रेस को (3982 करोड़) प्राप्त हुआ जबकि भाजपा को 3272 करोड़ रुपये तथा माकपा को 893 करोड़ रूपये प्राप्त हुए। बहुजन समाज पार्टी अकेली ऐसी पार्टी रही जिसको 100 प्रतिशत चंदा बेनामी स्त्रोंत से प्राप्त हुआ। इसी प्रकार कांग्रेस के चंदे का 83 प्रतिशत तथा भाजपा के चंदे का 65 प्रतिशत हिस्सा बेनामी स्त्रोत से प्राप्त हुआ।
चनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए सरकार के द्वारा लाये गये इलेक्टोरल बाँड किस सीमा तक प्रभावी हैं?
- वर्ष 2017 के केन्द्रीय बजट में सरकार के द्वारा चुनावी चंदे में पारदर्शिता के लिए इलेक्टोरल बाँड लाये गये।
- इलेक्टोरल बाँड योजना के तहत चंदा देने वाला व्यक्ति केवल चेक और डिजिटल भुगतान के द्वारा निर्धारित बैंको से बाँड खरीद सकता है। ये बाँड पंजीकृत राजनीतिक दल के निर्धारित बैंक खाते में ही भुनाये जा सकेंगे।
- किंतु इलेक्टोरल बाँड खरीदने वालों की पहचान गुप्त रखी जायेगी। इस गोपनीयता के पीछे सरकार का तर्क है कि नाम उजागर होने पर चंदा देने वाले विपक्ष एवं आयकर विभाग के निशाने पर आ जाते हैं।
- किंतु यहाँ ध्यान देने की जरूरत है कि इलेक्टोरल बाँड से नकद भुगतान तो रूक जायेगा लेकिन अब तक फंडिंग में जो पारदर्शिता थी वह भी समाप्त हो जायेगी।
- इस प्रकार स्पष्ट है कि चुनावी चंदे में पारदर्शिता के लिए लाये गये इलेक्टोरल बाँड प्रभावी नहीं हैं।
चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
- चुनावी चंदे में पूरी पारदर्शिता के लिए जरूरी है कि राष्ट्रीय चुनाव कोष का गठन किया जाये। इस राष्ट्रीय चुनाव कोष में लोग बिना किसी पार्टी को प्रमुखता देते हुए खुलकर चंदा दे सकेंगे।
- दरअसल राष्ट्रीय चुनाव कोष में एकत्रित धन को सभी राजनीतिक दलों के बीच उनके द्वारा प्राप्त किये गये वोटों के आधार पर बाँट दिया जायेगा।
- इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि चंदा देने वालों की निजता को बरकरार रखा जा सकेगा।
- इस प्रकार राजनीतिक दलों की सार्वजनिक फंडिंग शुरू होते ही निजी चंदे पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।
- सबसे बढ़कर चूँकि राष्ट्रीय चुनाव कोष सार्वजनिक फंड होगा अतः नियत्रंक एवं महालेखा परीक्षक अथवा किसी अन्य ऑडिटर से इस फंड का ऑडिट भी करवाया जा सकेगा।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता लाये बिना भ्रष्टाचार एवं काले धन पर नियंत्राण अंसभव है। उपर्युक्त सुझावों पर अमल करके चुनावी चंदे में पारदर्शिता लायी जा सकती है।