हाल ही मे भारत निर्वाचन आयोग के द्वारा लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ आयोजित कराने पर सहमति व्यक्त की गयी है। लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक-साथ आयोजित कराने के प्रमुख लाभ बताइए। साथ ही बताइए कि एक साथ चुनावों के आयोजन से कौन सी प्रमुख चनौतियाँ सामने आ सकती हैं?

हाल ही मे भारत निर्वाचन आयोग ने लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित कराने पर अपनी सहमति जता दी है। निर्वाचन आयुक्त ओे.पी. रावत ने स्पष्ट किया है कि सितम्बर, 2018 तक भारत निर्वाचन आयोग एक साथ चुनावों को आयोजित कराने के लिए तैयार हो जायेगा। ज्ञातव्य है कि आजादी के बाद से वर्ष 1967 तक लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही आयोजित किये गये थे किंतु आगे यह सम्भव नहीं हो सका। इसका प्रमुख कारण केन्द्र एवं राज्यों में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता थी जिसके कारण कार्यकाल पूरा करने से पहले ही केन्द्र एवं राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों का गठन होने लगा।

लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित कराने के प्रमुख लाभ

  • लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनावों को एक-साथ आयोजित कराने से भारी-भरकम चुनाव खर्च पर नियंत्रण लगाया जा सकेगा तथा बहुमूल्य संसाधनों को बचाया जा सकेगा।
  • चुनावों के दौरान भारी संख्या में मानव संसाधन का प्रयोग होता है जिससे उनका मूल कार्य प्रभावित होता है उदाहरण के तौर पर, चुनावों के दौरान शिक्षकों की ड्यूटी से शिक्षा का कार्य प्रभावित होता है। एक साथ चुनावों के आयोजन से इस स्थिति से बचा जा सकता हैं।
  • चुनावों के दौरान आचार संहिता लागू होती है जिसके कारण नीतियाँ प्रभावित होती हैं तथा जरूरी सेवाओं को नागरिकों तक पहुँचाने में विलम्ब होता है। एक साथ चुनावों के आयोजन से नीतियों पर सीमित समय के लिए ही प्रभाव पड़ेगा।
  • सबसे बढ़कर सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्ष की लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित कराने के पक्ष में है। उदाहरण के तौर पर, कांग्रेस सांसद सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता में गठित संसदीय समिति ने दिसम्बर 2015 में सौंपी गयी अपनी रिपोर्ट में एक साथ चुनावों को आयोजित कराने की सिफारिश की थी।

लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित कराने से आने वाली प्रमुख चुनौतियाँ

  • लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित कराने के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौती दोनों के कार्यकाल में भिन्नता का होना है।
  • नीति आयोग के अनुसार, यदि 2019 में लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराये जाते हैं तो कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल में 2 वर्ष से अधिक की कमी तथा कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल में 2 वर्ष से अधिक की बढ़ोतरी करनी पड़ सकती हैं।
  • सबसे बढ़कर लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनावों एक साथ आयोजित कराने का विरोध् क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के द्वारा किया जा सकता है। विशेषकर ऐसे क्षेत्रीय राजनीतिक दल जो एक ही राज्य तक सीमित हैं। इससे सहकारी संघवाद की भावना को ठेंस पहुँच सकती हैं।

निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि एक साथ चुनावों के आयोजन से बहुमूल्य समय एवं संसाधनों दोनों को बचाया जा सकता है। हालाँकि इस संबंध में उपर्युक्त चुनौतियों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

Posted on by