उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा कुछ समय पूर्व उत्तर प्रदेश के मदरसों में भी राष्ट्रगान को अनिवार्य बना दिया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार के इस निर्णय के विरूद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गयी तथा इस निर्णय को खारिज करने की माँग की गयी। हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया तथा उत्तर प्रदेश सरकार के निर्णय को सही ठहराया।
उच्च न्यायालय ने तर्क दिया कि राष्ट्रगान एवं राष्ट्रध्वज का आदर करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक दायित्व है। साथ ही न्यायालय ने याची को निर्देश दिया कि राष्ट्रगान के प्रति इस प्रकार की आपत्ति गलत है तथा उसका यह कदम पारस्परिक सौहार्द्र को बिगाड़ सकता है।
राष्ट्रगान के संबंध में न्यायालय के निर्णय के संबंध में मत एवं उपयुक्त तर्क
- न्यायालय का निर्णय पूर्णतः उचित है क्योंकि यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज एवं संविधान का आदर करे।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (A) (क) के अनुसार, भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि, वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शो, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज एवं राष्ट्रगान का आदर करे।
- इस प्रकार स्पष्ट है कि राष्ट्रगान एवं राष्ट्रध्वज का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है इसलिए राष्ट्रगान का गायन एवं राष्ट्रध्वज को फहराना सभी शिक्षण संस्थाओं के लिए अनिवार्य है।
- राष्ट्रगान किसी विशेष वर्ग अथवा सम्प्रदाय से सम्बंधित नहीं है अतः इसके गायन एवं इसके प्रति सम्मान से आपसी सौहार्द्र, सामंजस्य एवं भाईचारे को बढ़ावा देने में मदद मिलती है।
- राष्ट्रगान में भाईचारा को बढ़ावा देने के साथ-साथ देश के इतिहास, दूसरी प्रथाओं और संस्कृति को बढ़ावा देने के तथ्य भी मौजूद हैं अतः इसके विरूद्ध किसी सम्प्रदाय विशेष की आपत्ति पूर्णतः निराधार है।
- सबसे बढ़कर राष्ट्रगान, राष्ट्रीय अखंडता, पंथ निरपेक्षता एवं लोकतांत्रिक भावना को सशक्त बनाता है। यही कारण है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि ‘‘राष्ट्रध्वज केवल कपड़ा और स्याही का टुकड़ा मात्र नहीं है, बल्कि यह स्वाधीनता के लक्ष्य को हासिल करने का जरिया है।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राष्ट्रगान के सम्बंध में न्यायालय का निर्णय पूर्णतः उचित है। यह निर्णय राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के साथ-साथ भाईचारे एवं आपसी सौहार्द्र को सशक्तता प्रदान करता है।