प्रेस को लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ माना जाता है तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता को भारत में मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त है। क्या कारण है कि अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत की स्थिति काफी कमजोर बनी हुई है? भारत में अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्राता में सुधार के लिए कौन-कौन से प्रमुख उपाय किए जाने आवश्यक है?

विधयिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के पश्चात प्रेस को लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ कहा जाता है। इस चतुर्थ स्तंभ की मजबूती बहुत आवश्यक है। किंतु भारत में ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ की स्थिति में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है जो कि एक चिंता का विषय है।

‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (Reporters Without Borders)’ नामक गैर-सरकारी संगठन के द्वारा जारी किए जाने वाले ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम सूचकांक’ में भारत को वर्ष 2017 में 136वीं रैंकिंग प्रदान की गयी है जबकि पिछले वर्ष इसी सूचकांक के द्वारा भारत को 133वीं रैंकिंग प्रदान की गयी थी। इस तथ्य से पता चलता है कि ‘अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्राता’ के मामले में भारत की स्थिति गिरती जा रही है।

अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण

  • हाल ही में गौरी लंकेश की हत्या तथा इससे पूर्व गोविंद पानसारे, नरेन्द्र दाभोलकर एवं व्यापम के संबंध में अक्षय सिंह की हत्या आदि कारण अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्रता में प्रमुख बाध बनकर उभरे हैं।
  • ‘टीआरपी’ (TRP) के लिए मीडिया के द्वारा कम महत्व की घटनाओं को वरीयता देना जिससे लोग वास्तविक एवं महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में बहुत कम जानकारी प्राप्त कर पाते हैं।
  • मीडिया में पेड न्यूज (Paid News) का सिलसिला लगातार जारी है। चुनावों के दौरान इस प्रकार के समाचारों में काफी वृद्धि हो जाती है।
  • मीडिया चैनलों पर प्रतिबंध लगाना जैसा कि पिछले वर्ष 2016 में आतंकी हमले के प्रसारण के लिए सरकार ने ‘एनडीटीवी (NDTV) पर एक दिन का प्रतिबंध लगा दिया था। हालाँकि यह प्रतिबंध राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से लगाया गया था।
  • मीडिया एवं राजनीतिज्ञों के बीच गहरी सांठगांठ है। देश में अधिकांश ‘मीडिया चैनल’ राजनीतिक नेताओं के हैं जो कि स्वार्थ-प्रेरित खबरों को प्राथमिकता देते हैं।

अभिव्यक्ति एवं मीडिया की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए प्रमुख उपाय

  • प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (Press Council of India) को अधिक शक्ति प्रदान की जानी चाहिए ताकि वह प्रसारित समाचारों का समुचित निरीक्षण एवं निगरानी कर सके।
  • पेड न्यूज (Paid News)  को गैर-जमानती अपराध बना दिया जाना चाहिए तथा दोषी को शीघ्रातिशीघ्र कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए।
  • पत्रकारों, समाज के तार्किक चिंतकों आदि को समुचित सुरक्षा मुहैया करायी जानी चाहिए ताकि गौरी लंकेश जैसी घटनाओं को नियंत्रित किया जा सके।
  • राजनीति एवं मीडिया तथा उद्योग एवं मीडिया के बीच गठबंधन को समाप्त किया जाना चाहिए। ज्ञातव्य है कि देश में अधिकांश मीडिया चैनल या तो राजनीतिज्ञों के हैं या उद्योगपतियों के।
  • सबसे बढ़कर आम जनता को अधिक जागरूक एवं तार्किक होने की आवश्यकता है ताकि समाचारों की सत्यता की अपने स्तर से जाँच एवं पुष्टि की जा सके।

निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्राता में गिरावट के लिए स्वयं मीडिया ही प्रमुख रूप से उत्तरदायी है। उपर्युक्त उपायों पर अमल करके इस स्थिति में सुधर लाया जा सकता है।

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