विशेषण

विशेषण-जिस शब्द से संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता का बोध हो, उसे ‘विशेषण’ कहते है। यह विशेषता संज्ञा के आकार, अवस्था, रूप, गुण, स्वभाव, स्थिति आदि से सम्बन्धित होती है। जैसे-

(क)

संख्या

:

वहाँ चार लड़के बैठे हैं।

(ख)

आकार

:

अध्यापिका के हाथ में लम्बी छड़ी है।

(ग)

अवस्था

:

श्याम दस वर्ष का है।

(घ)

रूप

:

राधा सुन्दर लड़की है।

(ड.)

गुण

:

उसका कोट पुराना था।

(च)

स्वभाव

:

श्यामकृष्ण मिलनसार व्यक्ति है।

(छ)

स्थिति

:

शीला उनकी लाडली बेटी है।

संरचना की दृष्टि से विशेषण के भेद-

1.            मूल विशेषण-जिसमें एक ही सार्थक भाषिक ईकाई हो। जैसे-लाल, गोल, सफेद, कोमल।

2.            यौगिक विशेषण-जिसमें एकाधिक (सार्थक) ईकाईयाँ हों। जैसे-सामाजिक, रंगीन, दयालु।

               विशेष्य-उस शब्द को कहते हैं, जिसकी विशेषता बताई जाती है अर्थात् जिसकी विशेषता विशेषण से प्रकट होती है। यथा- मोहन सुन्दर बालक है। यहाँ ‘बालक’ विशेष्य है, क्योंकि ‘सुन्दर’ शब्द उसकी विशेषता बताता है।

               प्रविशेषण-प्रविशेषण उस शब्द को कहते हैं, जो विशेषण की विशेषता बताता है। यथा-कृष्ण बहुत  सुन्दर है। उसका निहायत गंदा घर है।

यहाँ ‘सुन्दर’ विशेषण की विशेषता ‘बहुत’ से व्यक्त हुई है। अतः ‘बहुत’ शब्द प्रविशेषण है।

               उद्देश्य विशेषण-वाक्य में विशेषण जब विशेष्य (संज्ञा/सर्वनाम) के पूर्व प्रयुक्त होता है तब वह उद्देश्य विशेषण कहलाता है। यथा-झूठी बात मत बोलो। आलसी लड़का सो रहा है।

               विधेय विशेषण-वाक्य में विशेषण का प्रयोग जब विशेष्य के बाद प्रयुक्त होता है तब वह विधेय विशेषण कहलाता है। यथा-वह बात झूठी थी। लड़का कामचोर है।
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