कुषाण वंश का सबसे महान शासक कनिष्क था।
कहा जाता है कि कनिष्क के चीन के साथ दो युद्ध हुए। पहले में हार के बाद दूसरे में जीत हासिल हुई। इन युद्ध के दौरान चीन का सेनापति पानचाओ था।
कनिष्क मध्य एशिया के क्षेत्र से निकलने वाले रेशम मार्ग पर भी अपना नियंत्रण स्थापित किया।
कनिष्क ने अपनी दो राजधानियां पेशावर (पुरुस्पुर)और मथुरा बनाई ।
कनिष्क बौद्ध धर्म का महान संरक्षक था। चौथी बौद्ध संगति का आयोजन इसी के सासन काल कश्मीर के कुंडलवन में हुआ था। जिसमें बौद्ध धर्म हीनयान और महायान में विभाजित हो गया।
कनिष्क महायान बौद्ध को मानने वाला था।
कनिष्क को दूसरा अशोक भी कहा जाता है।
कनिष्क विद्वानों का महान संरक्षक था। उसके दरबार में अश्वघोस, वसुमित्र, नागार्जुन, चरक, पार्श्व जैसे विद्वान कवि थे।
पार्श्व के कहने पर ही कनिष्क ने चतुर्थ बौद्ध संगति का आयोजन किया था।
अश्वाघोष को भारत का मिल्टन कहा जाता है।
नागार्जुन को भारत का आइंस्टीन कहा जाता है।
कनिष्क ने ७८ ईस्वी में शक संवत की शुरूआत की। जिसे २२ मार्च १९५७ को भारत में स्वीकार किया गया।
कनिष्क के बाद, वासिस्क,कनिष्क२, हुविष्क, वासुदेव कुषाण वंश के शासक हुए।
वासुदेव इस वंश का अंतिम शासक था ।