रोहिंग्या अवैध अप्रवासियों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यह एक मानवीय मामला है किन्तु इसके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा भी जरूरी है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा रोहिंग्या मामले पर नियमित सुनवाई के लिए 21 नवम्बर, 2017 की तिथि निर्धारित की गई है। न्यायालय के द्वारा कहा गया कि संविधान मानवीय मूल्यों के सिद्धांत पर आधारित है किन्तु इस मामले में आर्थिक, भौगोलिक एवं श्रमिक हितों का भी ध्यान रखना होगा। साथ ही सरकार को निर्देश दिया कि राष्ट्र के हितों एवं मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाये रखने में उसे एक बड़ी भूमिका निभानी होंगी।
रोहिंग्या अवैध अप्रवासी देश की सुरक्षा के लिए किस प्रकार हानिप्रद साबित हो सकते हैं?
- रोहिंग्या अवैध अप्रवासी है जो देश की सुरक्षा के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर रोहिंग्या म्यांमार से बांग्लादेश होकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में प्रवेश करते हैं किन्तु आगे जम्मू, मेवात, हैदराबाद एवं दिल्ली तक आ जाते हैं।
- देश के सीमांत से लेकर मध्य क्षेत्र तक ये बड़ी आसानी से आ जाते हैं। अतः इनके बीच उपस्थित उपद्रवी एवं अवांछित तत्व कानून व्यवस्था के साथ-साथ सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।
- रोहिंग्या मामला राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक हितों से भी संबंधित है क्योंकि इनको शरण देने से म्यांमार के साथ भारत के संबंध खराब हो सकते हैं।
- उल्लेखनीय है कि रोहिंग्या अवैध अप्रवासी पूर्वोत्तर के राज्यों का जनसांख्यिकीय संतुलन बिगाड़ सकते हैं जिससे स्थानीय नागरिकों एवं उनके बीच संघर्ष उत्पन्न हो सकता है। यह समस्या ठीक उसी प्रकार विकराल रूप धरण कर सकती है जैसा कि बांग्लादेश से आये चकमा एवं हजोंग शरणार्थियों को अरूणांचल प्रदेश में बसने में सामने आ रही है।
रोहिंग्या अवैध अप्रवासियों के संदर्भ में केन्द्र सरकार का मत न्यायालय से किस प्रकार अलग है?
- सर्वोच्च न्यायालय के विपरीत केन्द्र सरकार का मानना है कि अवैध आव्रजकों को वापस भेजने का अधिकार सिर्फ कार्यपालिका का है।
- केन्द्र सरकार इसे नीतिगत मामला मानती है तथा स्पष्ट रूप से कहती है कि यदि इस मामले में न्यायालय हस्तक्षेप करता है तो इससे अन्तर्राष्ट्रीय सम्बंधों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
- केन्द्र सरकार का मानना है कि यदि इस मामले को भावनात्मक तौर पर देखा जायेगा तो देश की सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक हितों को भी गंभीर हानि पहुँच सकती है।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि रोहिंग्या मामले में संतुलित एवं व्यवहारिक कदम उठाने की जरूरत है। सबसे बढ़कर इस मामले में न्यायालय को केन्द्र सरकार की आपत्ति का ध्यान रखना चाहिए।