हाल ही मे भारतीय प्रधानमंत्री के द्वारा सहकारिता आंदोलन के प्रणेताओं में शामिल लक्ष्मण राव इनामदार के जन्मशती समारोह को संबोधित किया गया तथा सहकारिता (Cooperative) को एक आंदोलन के रूप में संचालित करने का आह्वान किया गया। भारतीय प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि सहकारिता हमारे देश के स्वभाव में है। यह उधर में ली गयी व्यवस्था नहीं है। सहकारिता देश के चिंतन, स्वभाव एवं व्यवहार के अनुरूप व्यवस्था है। सबसे बढ़कर सहकारिता ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा परिर्वतन ला सकती है तथा ग्रामीण विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
‘सहकारिता’ किस प्रकार से ग्रामीण विकास को बढ़ावा दे सकती है?
- ‘सहकारिता’ साथ मिलकर आगे बढ़ने की व्यवस्था है। इसके तहत कई लोग आपस में मिलकर आर्थिक गातिविध्यिों को आगे बढ़ाते हैं।
- सहकारिता के संदर्भ में ‘अमूल’ (AMUL) का उदाहरण उल्लेखनीय है। इसके तहत ग्रामीण सहकारी समितियाँ आपस में मिलकर देश भर में दुग्ध आपूर्ति करती हैं।
- सहकारिता में महिलाओं के द्वारा भी बढ़ चढकर हिस्सा लिया जा रहा है। इस प्रकार सहकारिता ग्रामीण विकास के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण के मामले में भी अहम भूमिका अदा कर रही है।
- सहकारी समितियों को सरकार के द्वारा भी समुचित एवं व्यवस्थित तरीके से वित्तीय मदद उपलब्ध करायी जा रही है जिससे ग्रामीण विकास को प्रोत्साहन मिल रहा है उदाहरण के तौर पर, नाबार्ड (NABARD) के द्वारा राज्य सहकारी बैंकों को वित्त उपलब्ध कराया जाता है जो सहकारी समितियों को वित्तपोषित करते हैं।
किसानों की आय को बढ़ानें में सहकारिता किस प्रकार सहायक है?
- किसानों की आय को बढ़ाने में सहकारिता महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है। सहकारिता के माध्यम से दुग्ध उत्पादन के साथ-साथ मधुमक्खी पालन जैसे नये क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
- सहकारिता के माध्यम से किसान ‘लैण्ड पूलिंग’ (Land Pooling) कर सकते हैं। ‘लैण्ड पूलिंग’ से तात्पर्य जमीन के छोटे टुकड़ों को आपस में मिलाकर एक बड़े खेत (Area) का निर्माण करना है।
- कृषि से सम्बंधित सहकारी समितियाँ किसानों को खाद्य प्रसंस्करण की सुविध उपलब्ध करा सकती हैं जिससे न सिर्फ किसानों को उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य प्राप्त होगा बल्कि अनाजों, फलों एवं सब्जियों को नष्ट होने से भी बचाया जा सकेगा।
- सबसे बढ़कर कृषि से सम्बंधित सहकारी समितियाँ किसानों को परिवहन, भंडारण आदि जैसी सुविधओं को आसानी से उपलब्ध करा सकती हैं।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सहकारिता की भावना भारत की आत्मा में निहित है। सहकारिता न सिर्फ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है बल्कि 2022 तक किसानों की आय को दुगुना करने में भी अहम योगदान कर सकती है।