अकर्मक-सकर्मक क्रियाएँ
जिन क्रियाओं के प्रयोग में कर्म की आवश्यकता नहीं होती, उन्हें ‘अकर्मक’ और जिनमें कर्म की उपेक्षा रहती है, उन्हें ‘सकर्मक’ क्रियायें कहते है। जैसे-दौड़ना, से, चल, हँस, नहा आदि।
उदा0-मैं गया। वह सोता है। पक्षी उड़ते हैं।
‘जाना’, ‘सोना’ और ‘उठना’-आकर्मक क्रियाएँ
मैं वेतन पाता हूँ। उसने मिठाई खाई। उसने लड़के को पीटा।
पाना, खाना, पिटना (खा, पढ़, लिख, मार)-सकर्मक क्रियाएँ
कुछ क्रियाएँ कभी सकर्मक होती है और कभी अकर्मक। यह प्रयोग पर निर्भर है, इन्हें उभयविध या द्विविध क्रियाएँ कहते हैं। उदा0-वह खेल रहा है।(अकर्मक) वह हाकी खेल रहा है। (सकर्मक) वह पढ़ रही है। (अकर्मक) वह कविता पढ़ रही है। (सकर्मक)।
द्विकर्मक क्रिया: कई सकर्मक क्रियाओं के साथ दो कर्म प्रयुक्त होते हैं उन्हें द्विकर्मक क्रिया कहते हैं। यथा-
नसरीन ने नफीसा को पुस्तक पढ़ाई।
क्या पढ़ाई? -पुस्तक पढ़ाई, किसे पढ़ाई? -नफीसा को (क्रमशः नफीसा और पुस्तक दो कर्म है।)
मैं लड़के को नाटक दिखाता हूँ।
लड़के ने अध्यापिका को कविता सुनाया।
नोट: पदार्थवाची कर्म मुख्य कर्म कहलाता है और प्राणी बोधक कर्म गौण कर्म कहलाता है। गौण कर्म के साथ ‘को’ लगता है।
सहायक क्रिया-(मुख्य क्रिया रूप को पूरा करने में सहायक होने वाली क्रिया)-है, था, रहे थे, हुये थे।
अनेकार्थक क्रिया-हिन्दी में कुछ क्रियायें ऐसी हैं जिनका प्रयोग अनेक अर्थों में होता है। उदा0
1. खाना (क्रिया) है/अनेकार्थक प्रयोग ः वह मार खाता है। वह घूस खाता। वह दूसरों की कमाई खाता है। लोहे को जंग खाती है। मेरा सिर चक्कर खाता है।
2. लगना ः मीठा लगना, मन लगना, ठण्ड लगना, काम में लगना
3. छोड़ना ः स्थान छोड़ना, किसी को कष्ट में छोड़ना, चिट्ठी छोड़ना
4. मिलना ः कुछ मिलना, किसी से मिलना, घड़ी मिलना, चेहरा मिलना, सजा मिलना, दिल मिलना।