परम्परागत कृषि विकास योजना की शुरूआत वर्ष 2015 में की गयी। इस योजना का उद्देश्य जैविक कृषि के क्षेत्र को बढ़ाना है। ज्ञातव्य है कि जैविक उत्पादों की कीमत अधिक होती है। इस प्रकार यह किसानों के लिए अधिक आय का स्त्रोत बनती है। वाणिज्यिक स्तर पर जैविक कृषि को अपनाने के लिए क्लस्टर (Cluster) निर्माण हेतु किसानों को इस योजना के तहत प्रोत्साहित किया जा रहा है।

परम्परागत कृषि विकास योजना की शुरूआत वर्ष 2015 में की गयी। इस योजना का उद्देश्य जैविक कृषि के क्षेत्र को बढ़ाना है। ज्ञातव्य है कि जैविक उत्पादों की कीमत अधिक होती है। इस प्रकार यह किसानों के लिए अधिक आय का स्त्रोत बनती है। वाणिज्यिक स्तर पर जैविक कृषि को अपनाने के लिए क्लस्टर (Cluster) निर्माण हेतु किसानों को इस योजना के तहत प्रोत्साहित किया जा रहा है।

परम्परागत कृषि विकास योजना की प्रगति तथा भविष्य में उठाये जाने वाले कदम

  • परम्परागत कृषि विकास योजना के तहत किसानों को व्यावसायिक उद्देश्य के लिए जैविक कृषि को अपनाने तथा क्लस्टर निर्माण के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
  • प्रत्येक क्लस्टर के प्रत्येक किसान को प्रति हेक्टेयर की दर से 50,000 रूपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है।
  • वर्तमान समय तक 9186 क्लस्टर बनाये जा चुके हैं तथा भविष्य में 20 हेक्टेयर वाले 10 हजार आर्गेनिक क्लस्टर विकसित किये जायेंगे।
  • परम्परागत कृषि विकास योजना से पूर्व जैविक कृषि के अंतर्गत क्षेत्रफल में कापफी धीमी प्रगति हुई जबकि इस योजना के पश्चात जैविक कृषि के क्षेत्रफल में 176 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने लिए सरकार के द्वारा बनायी गयी तीन वर्षीय रूपरेखा में शामिल प्रमुख उद्देश्य

  • ग्रामीण बीज कार्यक्रम को 30,000 ग्रामों से बढ़ाकर 60,000 ग्रामों तक विस्तृत किया जायेगा। तथा पंचायत स्तर पर 500 बीज उत्पादन एवं प्रसंस्करण इकाईयाँ स्थापित की जायेंगी।
  • स्थानीय उद्यमियों के माध्यम से मिट्टी की जाँच के लिए 1,000 लघु प्रयोगशालाओं को बढ़ावा दिया जायेगा।
  • फसलों की कटाई के बाद की आधारभूत संरचना को सशक्त बनाने के लिए पाँच लाख मिलियन टन क्षमता के कोल्ड स्टोरेज, 1,000 भंडारण स्थल तथा 150 राइनिंग चेंबर स्थापित किये जायेंगे।
  • 350 कृषक उत्पादक संगठनों के माध्यम से  2.5 लाख हेक्टेयर भूमि में जैविक कृषि की जायेगी तथा 585 कृषि बाजारों को ई-नाम  (e-NAM) प्लेटफार्म से जोड़ा जायेगा।
  • अल्पावधिक ऋण जो वर्तमान में 43 प्रतिशत हैं, उन्हें बढ़ाकर 2018-19 तक 50 प्रतिशत किया जायेगा और छोटे तथा सीमांत किसानों को अधिक संख्या में शामिल किया जायेगा।
  • नीली क्रांति को बरकरार रखने के लिए मछलीपालन को बढ़ावा देना तथा राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की तर्ज पर राष्ट्रीय मवेशी विकास एजेन्सी का गठन करना।
  • उपज के स्तर को बनाये रखने के लिए तथा उत्पादन में वृद्धि के लिए जीनोमिक्स जीन संशोधन प्रौद्यागिकियों में अनुसंधन एवं विकास करना।
  • पशुओं के स्वास्थय के लिए ताप सहन करने वाली औषधियों का विकास करना।

निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि परम्परागत कृषि विकास योजना धरणीय विकास को बढ़ावा देने से संबंधित है। यह मृदा के स्वास्थ्य को बरकरार रखते हुए किसानों की आय को बढ़ावा देती है।

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