भारत में विभिन्न प्रकार की जलवायुविक एवं भौगोलिक परिस्थितियाँ पायी जाती है जिसके कारण यहाँ विभिन्न प्रकार के फलों एवं सब्जियों का उत्पादन संभव हो पाता है। फलों एवं सब्जियों के उत्पादन में भारत का विश्व में द्वितीय स्थान है। आम, केला एवं पपीता के उत्पादन में तो भारत का विश्व में प्रथम स्थान है।
किंतु जलवायु परिवर्तन की समस्या फलों के उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण उष्णकटिबंधीय के साथ-साथ उपोष्ण कटिबंधीय फलों के उत्पादन पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन का फसलों के उत्पादन पर प्रभाव
- तापमान में वृद्धि के कारण सेब, बादाम, चेरी आदि के उत्पादन में काफी गिरावट आयी है। तापमान बढ़ने के कारण इन फलों के वृक्षों में कलियाँ 2-3 सप्ताह पहले खिल जाती हैं। इसके कारण लगभग 70 प्रतिशत वृक्षों में मध्य मार्च में ही कलियाँ खिल जाती हैं। किंतु मार्च के अंत में अचानक होने वाली बर्फ बारी से अधिकांश कलियाँ नष्ट हो जाती हैं।
- जलवायु परिवर्तन फलों के प्राकृतिक रंगों को भी प्रभावित कर रहा है। उदाहरण के तौर पर सेब का लाल रंग साइनिड़िन-3 ग्लूकोसाइड नामक एंथोसायनिन से विकसित होता है किंतु तापमान की अधिकता के कारण एंथोसाइनिन का विकास प्रभावित होता है।
- बढ़ता तापमान एवं अनियमित वर्षा मधुमक्खियों की क्रियाशीलता को प्रभावित करती है जिसके कारण परागण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- बढ़ते तापमान के कारण फलों के पकने की दर भी बढ़ गयी है जिससे फलों की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
फलोत्पादन में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने हेतु प्रभावी रणनीतियाँ
- फलोत्पादन में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने हेतु फल वैज्ञानिकों को शोध कार्यक्रमों में नवीन कार्यों को शामिल करना होगा। उदाहरण के तौर पर मानकीकृत किस्मों का जलवायु की नयी परिस्थितयों में मूल्यांकन करना।
- अधिक कीमत वाले फलों मसलन, कीवी, आडू, खुबानी, जैतून एवं अखरोट आदि के सम्बंध में फसल विविधीकरण की नीति को अपनाना।
- अधिक तापमान एवं अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड सहन करने वाली किस्मों का विकास करना।
- फलों की ऐसी किस्मों का विकास करना जो अधिक गर्मी एवं सुरक्षा सहने में सक्षम हों।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन की समस्या फलोत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। उपर्युक्त रणनीतियों पर कार्य करके जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सकता है।