सूचना का अधिकार अधिनियम 12 अक्टूबर, 2005 को लागू किया गया तथा इससे प्रशासन में पारदर्शिता का एक नया युग प्रारम्भ हुआ। तकरीबन 50 लाख आरटीआई आवेदन प्रतिवर्ष किये जा रहे हैं। इससे पता चलता है कि लोगों ने इस कानून को कापफी अधिक महत्व प्रदान किया है। यद्यपि इसके क्रियान्वयन में कई प्रकार की खामियाँ सामने आयी है किन्तु फिर भी आम जनता को इसमें उम्मीद की एक किरण नजर आती है।
सूचना के अधिकार अधिनियम का मूल्यांकन निम्नलिखित है
- यद्यपि सूचना के अधिकार अधिनियम ने प्रश्न पूँछने की संस्कृति को जन्म दिया है किन्तु अधिकांश मामलों में समुचित जानकारी नही दी जाती है जिससे लोगों को आगे अपील करनी पड़ती है।
- कुछ मामलों में लोगों को 30 दिन की तय समयावधि के भीतर भी जानकारी नहीं दी जाती है जिससे लोगों में निराशा आती है।
- देश में अधिकांश संगठनों को इस अधिनियम के दायरे में ‘लोक प्राधिकारी’ के रूप में शामिल किया जा चुका है किन्तु अभी भी कई संगठन ऐसे हैं जिन्हें ‘लोक प्राधिकारी’ की परिभाषा के तहत शामिल किया जाना जरूरी है।
- यद्यपि सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत कुछ अधिकारियों ने उत्कृष्ट कार्य करके दिखाया है तथा समय पर समुचित सूचनायें उपलब्ध करवायी हैं किन्तु अधिकांश नौकरशाह अभी भी ‘ऑफिसिएल सीक्रेट्स एक्ट (Official Secrets Act)’ का प्रयोग करके सूचना प्रदान करने से बचते हैं।
क्या सूचना का अधिकार अधिनियम अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सका है?
- उपर्युक्त मूल्यांकन से स्पष्ट है कि सूचना का अधिकार अधिनियम अपने उद्देश्य को अंशतः ही प्राप्त कर सका है।
- इसका सबसे प्रमुख कारण इसे लागू करने में राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी का होना एवं अधिकारियो में व्यवहारगत परिवर्तन में कमी का होना रहा है।
सूचना के अधिकार अधिनियम में सुधार के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
सूचना के अधिकार अधिनियम के बारे में जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहिए ताकि अधिकाधिक संख्या में इसका प्रयोग किया जा सके।
- नोलन समिति (Nolan Committee) के द्वारा दिए गये सुझावों को लागू किया जाना चाहिए। ज्ञातव्य है कि नोलन समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है कि नौकरशाहों को नैतिक मूल्यों के साथ-साथ तकनीकी का प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।
- सबसे बढ़कर केन्द्रीय सूचना आयोग को शक्तिशाली बनाये जाने की जरूरत है ताकि इसके आदेशों को लागू किया जा सके एवं राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में लाया जा सके।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि 12 वर्षों के दौरान सूचना के अधिकार अधिनियम की उपलब्धि मिली-जुली रही है। इसके क्रियान्वयन में कई प्रकार की खामियाँ है किंतु इन्हें उपर्युक्त सुझावों को लागू करके दूर किया जा सकता है।