भावनात्मक बद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) एक ऐसी क्षमता है जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति स्वयं की भावनाओं के साथ-साथ दूसरों की भावनाओं को न सिर्फ पहचान पाता है बल्कि उनका प्रबंधन भी कर पाता है। भावनात्मक बद्धिमत्ता की क्षमता कुछ हद तक जन्मजात होती है किन्तु शिक्षण-प्रशिक्षण के द्वारा भी इसे काफी हद तक सीखा एवं सिखाया जा सकता है।
भावनात्मक बद्धिमत्ता संस्कृति को किस प्रकार प्रभावित करती है?
- भावनात्मक बद्धिमत्ता संस्कृति के भावनात्मक पक्ष को गहराई से प्रभावित करती है। उदाहरण के तौर पर कई नृजातीय समूहों में भावों की अभिव्यक्ति को ही महत्व दिया जाता है। चूँकि भावनात्मक बद्धिमत्ता में भावों का ही प्रबंधन किया जाता है अतः भावनात्मक अभिव्यक्ति नृजातीय समूहों की संस्कृतियों को भी प्रभावित करती है।
- इसी प्रकार भावनात्मक अभिव्यक्ति का निर्धारण संस्कृति से काफी गहराई से जुड़ा रहता है। उदाहरण के तौर पर भारतीय संस्कृति में पितृसत्तात्मक भावना की प्रधानता रही है जिसके कारण महिलाओं को अधिक स्वाधीनता नहीं मिल सकी है जबकि पश्चिमी संस्कृति में महिलाओं को अधिक स्वाधीनता प्रदान की गयी है जिससे वे अधिक स्वच्छंदता से अपने भावों को अभिव्यक्त करती हैं।
भारतीय समाज एवं पश्चिमी देशों के समाज की भावनात्मक बद्धिमत्ता में प्रमुख अंतर
- भारतीय समाज में भावनात्मक बद्धिमत्ताका प्रयोग आत्म-नियंत्राण आदि के लिए किया जाता है जबकि पश्चिमी देशों के समाज में भावनात्मक बुद्धि का इस्तेमाल स्वयं तथा अपने आस-पास के लोगों के व्यवहार को प्रबंधित करने के लिए किया जाता है।
- इसी प्रकार भारतीय समाज में भावनात्मक बुद्धि का प्रयोग अधिकांशतः सामूहिक उपलब्धि के लिए किया जाता है जबकि पश्चिमी देशों में भावनात्मक बुद्धि का प्रयोग व्यक्तिगत उपलब्धि के लिए किया जाता है।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भावनात्मक बद्धिमत्ता स्वयं एवं दूसरों की भावनाओं को प्रबंधित करने की क्षमता है। पश्चिमी समाज एवं भारतीय समाज की भावनात्मक बद्धिमत्ता में अंतर का प्रमुख कारण सांस्कृतिक एवं उद्देश्यपरक भिन्नता है।