खनन, बाँध एवं अन्य बड़े पैमाने की परियोजनाओं के लिए आवश्यक भूमि अधिकांशतः आदिवासियों, पहाड़ी निवासियों एवं ग्रामीण समुदायों से अर्जित की जाती है। विस्थापित व्यक्तियों को कानूनी प्रावधनों के अनुरूप मौद्रिक मुआवज़ा दिया जाता है। फिर भी, भुगतान प्रायः धीमी गति से होता है। किसी भी हालत में विस्थापित परिवार लम्बे समय तक जीवनयापन नहीं कर पाते। इन लोगों के पास बाज़ार की आवश्यकतानुसार किसी दूसरे धंधे में लगने का कौशल भी नहीं होता है। वे आखिरकार कम मज़दूरी वाले आवर्जिक (प्रवासी) श्रमिक बन जाते हैं। इसके अलावा, उनके सामुदायिक जीवन के परम्परागत तरीके अधिकांशतः समाप्त हो जाते हैं। अतः विकास के लाभ उद्योगों, उद्योगपतियों एवं नगरीय समुदायों को चले जाते हैं, जबकि विकास की लागत इन ग़रीब असहाय लोगों पर डाल दी जाती है। लागतों एवं लाभों का यह अनुचित वितरण अनैतिक है। यदि आपको ऐसे विस्थापित व्यक्तियों के लिए अच्छे मुआवज़े एवं पुनःवास की नीति का मसौदा बनाने का कार्य दिया जाता है, तो आप इस समस्या के सम्बन्ध में क्या दृष्टिकोण रखेंगे एवं आपके द्वारा सुझाई गई नीति के मुख्य तत्त्व कौन-कौन से होंगे?

यह मामला आर्थिक विकास एवं वंचित समुदायों के हितों के बीच द्वंद्व से सम्बंधित है। वस्तुतः समस्या इस बात में निहित है कि किस प्रकार वंचित समुदाय के हितों को संरक्षित रखते हुए विकास से सम्बंधित परियोजनाओं को संचालित किया जा सके।

इस समस्या के संबंध में मेरे द्वारा निम्न दृष्टिकोण रखा जायेगा

  • देश के विकास के लिए खनन, बाँध् एवं अन्य बड़ी परियोजनाओं का संचालन अनिवार्य है किंतु इस संबंध में यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि वंचित एवं गरीब वर्ग के हितों को हानि न पहुँचे।
  • अतः मेरा दृष्टिकोण यह होगा कि इन परियोजनाओं के संचालन के साथ-साथ वंचित एवं गरीब वर्ग के हितों को संरक्षित रखा जाये।
  • इसके साथ ही मेरा दृष्टिकोण यह भी होगा कि इन परियोजनाओं से विस्थापित लोगों का समुचित पुनर्वास किया जाये तथा उन्हे स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जायें।
  • इसके लिए इन विस्थापित एवं प्रभावित लोगों को सम्बंधित परियोजनाओं में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना होगा ताकि इन्हे आजीविका का संकट न झेलना पड़े।
  • सबसे बढ़कर मेरा दृष्टिकोण समावेशी विकास से संबंधित होगा ताकि उपर्युक्त विकास परियोजनाओं के लाभ का समुचित बँटवारा इन वंचित एवं विस्थापित लोगों के मध्य भी किया जा सके।

इस मामले के सम्बंध में मेरे द्वारा सुझाई गयी नीति के प्रमुख तत्व निम्नलिखित होंगे

  • खनन, बाँध एवं अन्य बड़ी परियोजनाओं के प्रभाव का विस्तृत अध्ययन किया जाये तथा ऐसा रास्ता अपनाया जाये ताकि कम से कम भूमि का अधिग्रहण किया जाये और कम से कम लोगों को विस्थापित होना पड़े।
  • इस संबंध में तकनीकी का इस्तेमाल किया जाये ताकि पता लगाया जा सके कि खनन के लिए उपयुक्त स्थान कौन सा है। उदाहरण के तौर पर सुदूर संवेदन विधि से ज्ञात किया जा सकता है कि कौन सा स्थान धातु एवं खनिज बहुल है। इसका लाभ यह होगा कि विस्तृत भूमि में खनन के स्थान पर ठीक उसी स्थान का खनन किया जा सकेगा जो धातु एवं खनिज बहुल है।
  • मेरे द्वारा सुझाई गयी नीति में प्रभावित एवं विस्थापित होने वाले लोगों के समुचित एवं समय पर पुनर्वास का विस्तृत ब्यौरा शामिल होगा ताकि इन लोगों को शीघ्रातिशीघ्र नजदीकी स्थान में पुनर्वासित किया जा सके।
  • इसी प्रकार सुझाई गयी नीति में विस्थापित लोगों के लिए पर्याप्त मुआवजे का प्रावधान भी शामिल होगा ताकि उन्हे शुरुआती स्तर में किसी प्रकार की समस्या का सामना न करना पड़ा।
  • खनन, बाँध एवं अन्य बड़ी परियोजनाओं के संचालन के लिए उत्तरदायी कम्पनियों के लिए यह सुझाव शामिल होगा कि वे ‘कार्पोरेट सामाजिक दायित्व’ (CRS) के तहत प्रभावित लोगों को कौशल प्रशिक्षण प्रदान करें तथा उन्हे संबंधित परियोजनाओं में रोजगार के अवसर उपलब्ध करायें।

इस प्रकार मेरे द्वारा सुझाई गई नीति का उद्देश्य समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त करना होगा ताकि वंचित एवं गरीब तबके को भी विकास की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके।

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