स, श, ष का उच्चारण:
ये तीनों ऊष्म व्यंजन है क्योंकि इन्हें बोलने के क्रम में साँस की ऊष्मा अधिक तीव्र गति से चलती है। चूँकि, इन व्यंजनों का उच्चारण संघर्षण की प्रक्रिया के फलस्वरूप होता है, इसलिए इन्हें ‘संघर्षी व्यंजन’ भी कहते है।
श - इसके उच्चारण में जीभ, तालु का स्पर्श करती है और हवा मुँख के दोनों बगलों का स्पर्श करती हुई, बाहर निकलती है, इसलिए इसे तालव्य ‘श’ कहते है।
ष - इसके उच्चारण में जीह्वा मूद्र्धा को स्पर्श करती है इसलिए यह मूद्र्धान ‘ष’ कहलाता है। बोलने की प्रक्रिया में मूद्र्धान ष का उच्चारण भी तालव्य श की भाँति होता है, किन्तु लिखने में इसका अन्तर विद्यमान है।
सामान्यतः मूर्द्धन्य ष का प्रयोग तत्सम शब्दों में अधिक होता है। जैसे- निष्ठा, अनुष्ठान, मिष्ठान, विषाद, विषम आदि।
स - इसके उच्चारण में जीभ दाँतों का स्पर्श करती है, इसलिए इसे दन्त ‘स’ कहा जाता है।
नोट: -
1. तालव्य ‘श’ का प्रयोग सामान्यतः अरबी, फारसी एवं अंग्रेजी शब्दों में अधिक होता है। जैसे-शराब, स्टेशन, लाश, लावारिश आदि।
2. तालव्य ‘श’ और दन्त स के अशुद्ध उच्चारण से प्रायः गलत शब्द बन जाते है और उनका अर्थ भी बदल जाता है।
जैसे -
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अंश - भाग या हिस्सा,
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अंस-कंधा या स्कन्ध
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शकल - आदा
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सकल - सम्पूर्ण / पूरा
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शान्त - धैर्य युक्त
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सान्त - अन्त सहित
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शर - बाण,
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सर - सरोवर
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शंकर - भगवान (शिव)
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संकर - मिश्रण
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