पाइका विद्रोह के बारे में आप क्या जानते हैं, सविस्तार स्पष्ट कीजिए? हाल ही में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री के द्वारा किन आधारों पर पाइका विद्रोह को भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा दिए जाने की बात कही गयी है? साथ ही बताइए कि पाइका विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम घोषित किये जाने के संबंध में क्या विवाद है?

पाइका लड़ाकू किसानों की एक जाति थी जो ओडिशा ‘तत्कालीन उड़ीसा’ के गजपति शासकों के अधीन निवास करते थे। पाइका आमतौर पर कृषि का कार्य ही करते थे किंतु युद्ध के समय शासक को सैन्य सहायता भी उपलब्ध् कराते थे। इन पाइका लड़ाकू किसानों को गजपति शासकों के द्वारा लगान मुक्त भूमि प्रदान की गयी थी जिस पर इनका वंशानुगत अधिकार था।

आगे अंग्रेजों के द्वारा जब खुर्दा के राजा को पराजित किया गया तथा ब्रिटिश राजस्व बंदोबस्त व्यवस्था को लागू किया गया तो खुर्दा के राजा के सेनापति बख्शी जगबंधु विद्याधर के नेतृत्व में पाइका लड़ाकू किसानों ने अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। दरअसल अंग्रेजों ने पाइकाओं से उनकी वंशानुगत भूमि छीन ली थी। पाइका खेतिहर समुदाय ने ब्रिटिश राजस्व व्यवस्था का जोरदार विरोध किया जिसके कारण अंग्रेजों को अपनी नयी राजस्व प्रणाली वापस लेनी पड़ी।

किन आधारों पर पाइका विद्रोह को मानव संसाधन मंत्री के द्वारा भारत के प्रथम स्वंतत्रता संग्राम का दर्जा देने की बात कही गयी है?

हाल ही में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडे़कर के द्वारा 1817 ई. में घटित पाइका विद्रोह को भारत के प्रथम स्वंतत्रता संग्राम का दर्जा दिये जाने की बात कही गयी है। उन्होंने इसे वर्ष 2018 के सत्र से एनसीईआरटी (NCERT) की पुस्तकों में शामिल करने की बात भी कही है। निम्नलिखित आधारो पर इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना जा सकता है-

  • पाइका विद्रोह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के विरूद्ध एक सुसंगठित विद्रोह था जिसमें सभी वर्ग के लोगों ने भाग लिया था।
  • पाइका विद्रोह एवं इसके समान कईं अन्य विद्रोहों में ही 1857 के सिपाही विद्रोह के कारण छिपे हुए हैं।
  • औपनिवेशिक शासन के विरूद्ध हुए पूर्व के अन्य विद्रोहों से पाइका विद्रोह इस मायने में अलग था कि इसमें व्यापक जन-भागीदारी थी।

पाइका विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा दिये जाने के संबंध में विवाद :

  • पाइका विद्रोह की 200वीं वर्षगांठ पर जब मानव संसाधन मंत्री ने इसे देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा देने की बात कही तो सर्वप्रथम केरल के इतिहासकारों ने इसका विरोध किया।
  • केरल के इतिहासकारों का कहना है कि पाइका विद्रोह के पहले ही दक्षिण भारत में कईं ऐसे विद्रोह अंग्रेजों के विरूद्ध हो चुके हैं किंतु इन्हें कभी मान्यता नहीं मिली।
  • इनमें से कुछ इतिहासकारों का कहना है कि 1721 ई. के अटिंगल विद्रोह को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम घोषित किया जाना चाहिए। ज्ञातव्य है कि अटिंगल विद्रोह के तहत तत्कालीन बेनाद रियासत के लोगों ने अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह किया तथा उनके 100 से अधिक सैनिकों की हत्या कर दी।
  • इसी प्रकार कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 1741 ई. में त्रवणकोर के राजा मार्तण्ड वर्मा और डच ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच घटित ‘कोलहेल युद्ध’ को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा मिलना चाहिए। ज्ञातव्य है कि ‘कोलहेल युद्ध’ में मार्तण्ड वर्मा ने डच ईस्ट इंडिया को पराजित किया था।

निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पाइका विद्रोह को इतिहास में उच्च स्थान मिलना जरूरी है किंतु इसे देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में घोषित करने से पूर्व इतिहासकारों एवं शिक्षाविदों से समुचित तथा व्यापक विचार-विमर्श किया जाना आवश्यक है।

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