किसी राष्ट्र के समग्र विकास की नींव उसके मजबूत आर्थिक आधार पर निर्भर करती है। ज्ञातव्य है कि कोई राष्ट्र आर्थिक आधार पर जितना अधिक विकसित होगा उसके पास उतने ही अधिक संसाधन होंगे। इन संसाधनों के बल पर वह आधारभूत संरचना को मजबूत बनाता है जिससे औद्योगिक विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। सबसे बढ़कर वह अपने देश की जनता को जीवन की मूलभूत सुविधओं को आसानी से उपलब्ध करा पाने में सक्षम होता है।
किंतु यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या सामाजिक मूल्यों के बिना आर्थिक विकास संभव है? दरअसल आर्थिक विकास नागरिकों एवं समाज पर ही निर्भर करता है। यदि किसी देश के नागरिक अयोग्य होंगे और समाज में अंधविश्वास एवं रूढ़िवादिता का बोलबाला होगा तो उस देश का आर्थिक विकास संभव नहीं हो सकता है।
वस्तुतः प्रगतिशील एवं शिक्षित नागरिकों पर ही देश का विकास संभव है। प्रगतिशील विचारों वाले शिक्षित नागरिक ही नवाचार को आगे बढ़ाते हैं तथा तकनीकी विकास को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। यहाँ एक बात स्पष्ट है कि उन्नत सामाजिक मूल्य ही शिक्षित एवं प्रगतिशील नागरिकों के विकास में मदद करते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि मनुष्य ने उन्नत सामाजिक मूल्यों को न अपनाया होता तो वह अभी भी पाषाणकालीन असभ्य एवं बर्बर जीवन जी रहा होता।
समावेशी विकास के लिए आर्थिक मूल्यों की तुलना में सामाजिक मूल्यों को वरीयता देना क्यों जरूरी है?
- समावेशी विकास के लिए आर्थिक मूल्यों की तुलना में सामाजिक मूल्यों को वरीयता देना इसलिए जरूरी है क्योंकि यदि आर्थिक विकास का समुचित लाभ समाज के सभी लोगों तक नहीं पहुँचता है तो इससे अधिकांश पूँजी एवं संसाधन कुछ ही लोगों के हाथों में केन्द्रित होकर रह जायेंगे।
- इसी प्रकार यदि किसी देश के द्वारा महज आर्थिक मूल्यों एवं आर्थिक विकास पर ध्यान दिया जाता है तो वह देश आर्थिक रूप से तो संपन्न हो जायेगा किंतु सामाजिक विकास के मामले में काफी पीछे छूट जायेगा।
- उदाहरण के तौर पर खाड़ी देश तेल एवं गैस जैसे संसाधनों में संपन्न होने के कारण आर्थिक रूप से बेहद धनी हैं किंतु उन्नत सामाजिक मूल्यों के अभाव में ये देश सामाजिक रूप से काफी पिछड़े हुए हैं। इन देशों में अभी भी महिलायें परतंत्रता का जीवन जीने के लिए बाध्य हैं।
- सबसे बढ़कर समुचित एवं समावेशी विकास तभी संभव है जब आर्थिक विकास का लाभ समाज के सर्वाधिक पिछड़े एवं वंचित वर्ग तक पहुँचे। सामाजिक मूल्यों में धनी राष्ट्र ही आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम कतार के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचा सकता है और अंत्योदय की अवधारणा को साकार रूप प्रदान कर सकता है।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राष्ट्र के विकास के लिए आर्थिक मूल्यों का होना जरूरी है किंतु राष्ट्र के समावेशी विकास के लिए आर्थिक मूल्यों की तुलना में सामाजिक मूल्यों को वरीयता प्रदान किया जाना आवश्यक है।