मूल्यों से तात्पर्य ऐसे सिद्धांतों अथवा मानकों से है जिनके द्वारा मानव व्यवहार को निर्देशित किया जाता है। कुछ मूल्य सार्वभौमिक प्रकृति के होते हैं मसलन सत्य, अहिंसा, ईमानदारी आदि जबकि कुछ मूल्य देश, काल एवं परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर भारतीय समाज में सामूहिक उपलब्धि को महत्व दिया जाता है जबकि पश्चिमी देशों में व्यक्तिगत उपलब्धि को ही सर्वोपरि माना जाता है।
मानवीय मूल्यों के विकास में परिवार, समाज एवं विद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मूल्यों के विकास में हम परिवार, समाज एवं विद्यालय की भूमिका को निम्न प्रकार से समझ सकते हैं-
परिवार की भूमिका :
- परिवार को प्राथमिक पाठशाला माना जाता है अर्थात मूल्यों को परिवार में ही बोया जाता है।
- बच्चे अपने माता-पिता को आचरण का न सिर्फ गहराई से अवलोकन करते हैं बल्कि स्वयं के व्यवहार में उसे ढालने का प्रयास भी करते हैं।
- उदाहरण के तौर पर यदि परिवार के सभी सदस्य आपस में सौहार्द्रपूर्ण तरीके से रहते हैं और सत्यता एवं ईमानदारी का व्यवहार करते हैं तो निश्चित तौर पर बच्चे इन मूल्यों के प्रति आकर्षित होते हैं और स्वयं के व्यवहार में इन मूल्यों को प्राथमिकता प्रदान करते हैं। इन मूल्यों से युक्त बच्चे भविष्य में सक्षम नागरिकों के रूप में विकसित होते हैं।
समाज की भूमिका
- मूल्यों के विकास में समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि परिवार के पश्चात समाज ही वह स्थान है जहाँ बच्चों के व्यक्तित्व का विकास होता है।
- समाज में प्रचलित मान्यतायें, रीति-रिवाज, नैतिक मानक आदि मूल्यों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
- इस प्रकार स्पष्ट है कि एक बेहतर समाज बेहतर नागरिकों के विकास में अहम भूमिका अदा करता है।
विद्यालय की भूमिका :
- परिवार एवं समाज के साथ-साथ विद्यालय की मूल्यों के विकास एवं सुदृढ़ चरित्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विद्यालय में बच्चों को समानता, अनुशासन, दृढ़ता एवं परिश्रम जैसे मूल्यों को सीखने का अवसर मिलता है।
- विद्यालयों में आयोजित परीक्षाओं से बच्चों के भीतर धैर्य एवं कुशलता जैसे मूल्यों का विकास होता है तथा खेल प्रतियोगिताओं आदि से आपसी सहयोग एवं समय प्रबंधन जैसे मूल्यों का विकास होता है।
- सबसे बढ़कर बच्चे शिक्षकों को अपना रोल मॉडल मानते हैं और उनसे वे सम्मान, जवाबदेही, सकारात्मक सोच तथा साहस जैसे मूल्यों को सीखते हैं।
- इस प्रकार स्पष्ट है कि सक्षम एवं समर्थ नागरिकों के निर्माण में विद्यालय की भी अहम भूमिका होती है।
सक्षम तथा सशक्त राष्ट्र के निर्माण में नागरिकों की भूमिका :
- सक्षम तथा सशक्त राष्ट्र के निर्माण में नागरिकों की अहम भूमिका होती है। ज्ञातव्य है कि शिक्षित एवं कुशल नागरिक बेहतर मानव संसाधन होते हैं जो देश के आर्थिक आधार को मजबूती प्रदान करते हैं।
- शिक्षित एवं तकनीकी रूप से कुशल नागरिक नवाचार एवं नवोन्मेष को जन्म देते हैं। ज्ञातव्य है कि वर्तमान समय में देश की प्रगति नवाचार एवं नवोन्मेष पर ही निर्भर करती है।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मूल्यों के विकास एवं सक्षम नागरिकों के निर्माण में परिवार, समाज एवं विद्यालय की अहम भूमिका होती है। सबसे बढ़कर सक्षम नागरिक ही सशक्त राष्ट्र की आधारशिला निर्मित करते हैं और उसे प्रगति के मार्ग पर आगे ले जाते हैं।