निम्नलिखित शब्दावलियों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए- (a) विधि और नैतिकता (b) नैतिक प्रबंधन एवं नैतिकता का प्रबंधन (c) भेदभाव एवं अधिमानी बर्ताव (d) वैयक्तिक नैतिकता एवं संव्यावसायिक नैतिकता

नैतिकता, सत्यनिष्ठा एवं अभिरूचि के संदर्भ में अनेक ऐसे शब्द पाये जाते हैं जिनके बीच अत्यधिक समानता होती है किंतु वास्तव में इनके अर्थ में काफी अंतर होता है।

  1. विधि एवं नैतिकता- विधि से तात्पर्य कानून (Law) से होता है। विधि का निर्माण विधानमंडल के द्वारा किया जाता है तथा इसके क्रियान्वयन का उत्तर:दायित्व सरकार पर होता है। विधि् का उल्लंघन दण्डनीय अपराध माना जाता है। उदाहरण के तौर पर चोरी करना विधि् के अनुसार दण्डनीय अपराध है।

जबकि नैतिकता से तात्पर्य समाज के द्वारा स्वीकृत मूल्यों एवं मापदण्डों से है। इस प्रकार नैतिकता, विधि से अलग है। नैतिकता के उल्लंघन पर जरूरी नहीं है कि सजा मिले जबकि विधि के उल्लंघन पर सजा मिलनी निश्चित है।

  1. नैतिक प्रबंधन एवं नैतिकता का प्रबंधन- नैतिक प्रबंधन से तात्पर्य उन प्रबंधानात्मक व्यवहारों से है जो व्यापार की नैतिकता से साम्यता रखते हैं। नैतिक प्रबंधन का उद्देश्य लोगों के व्यवहारों को समाज स्वीकृत मूल्यों एवं मापदण्डों के अनुकूल बनाना है।

जबकि नैतिकता के प्रबंधन का संबंध किसी संगठन अथवा कंपनी के सामाजिक उत्तर दायित्व से है। यह एक ऐसा अनुशासन है जो इस बात से संबंधित है कि क्या सही है और क्या गलत है। सबसे बढ़कर यह एक मानक व्यवहार है जो किसी प्रबंधन को उसकी जिम्मेदारी के लिए निर्देशित करता है।

  1.  भेदभाव एवं अधिमानी बर्ताव- भेदभाव से तात्पर्य ऐसे व्यवहार से है जो पद, प्रतिष्ठा, जाति, लिंग एवं धर्म से प्रभावित होकर किया जाता है। उदाहरण के तौर पर जब कोई सिविल सेवक एक ही काम के लिए आये हुए धनी एवं निर्धन व्यक्ति में से धनी व्यक्ति को वरीयता देता है तो इसे भेदभावपूर्ण व्यवहार माना जायेगा।

जबकि अधिमानी बर्ताव से तात्पर्य ऐसे व्यवहार से है जब किसी की जरूरत को देखकर कदम उठाया जाता है। उदाहरण के तौर पर किसी वृद्ध महिला एवं पुरूष में से वृद्ध महिला के कार्य को वरीयता देना अधिमानी बर्ताव माना जायेगा।

  1.  वैयक्तिक नैतिकता एवं संव्यावसायिक नैतिकता : वैयक्तिक नैतिकता से तात्पर्य किसी व्यक्ति के द्वारा स्वयं के स्तर पर नैतिकता के पालन से है। उदाहरण के तौर पर जब कोई व्यक्ति स्वयं के स्तर पर समाज के द्वारा स्वीकृत मूल्यों एवं मापदण्डों का पालन करता है तो उसे वैयक्तिक नैतिकता कहते हैं।

जबकि संव्यावसायिक से तात्पर्य व्यापारिक स्तर पर नैतिकता के पालन से है। उदाहरण के तौर पर जब कोई ऐसी कंपनी, जो खाद्य पदार्थों की निर्माता है, अपने उत्पादों में ऐसी सामग्री का उपयोग नहीं करती है जो उपभोक्ताओं के लिए हानिकारक है, तो कंपनी के इस प्रकार के व्यवहार को संव्यावसायिक नैतिकता माना जायेगा।

निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यद्यपि उपर्युक्त उल्लिखित शब्दावलियों के बीच काफी न्यून अंतर है किंतु यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है तथा नैतिकता के व्यवहार में अहम भूमिका अदा करता है।

Posted on by