भारत में भूख की स्थिति गंभीर स्वरूप धारण कर चुकी है। वैश्विक भूख सूचकांक से यह बात पुष्ट हो जाती है। वर्ष 2017 में जारी किये गये वैश्विक भूख सूचकांक में भारत को 100वां स्थान प्रदान किया गया जबकि पिछले वर्ष इसी सूचकांक में भारत को 97वां स्थान प्रदान किया गया था। भूख की इस स्थिति में सुधार तथा समुचित पोषण उपलब्ध कराने के लिए ऐसा विचार व्यक्त किया गया है कि देश में जीन संविद्धर्त फसलों को बहुतायत में अपनाया जाना चाहिए।
जीन संविद्धर्त फसलों के पक्ष में तर्क :
- जनेटिक इंजीनियरिंग विधि के माघ्यम से फसलों के गुणों में आवश्यक परिवर्तन लाया जा सकता है। इससे फसलों को न सिर्फ कीटरोधी बनाया जा सकता है बल्कि उन्हें सूखारोधी भी बनाया जा सकता है।
- जिस प्रकार तीव्र गति से जलवायु परिवर्तन की समस्या गंम्भीर रूप धारण करती जा रही है उससे यह जरूरी हो गया है कि ऐसी फसलें उगायी जायें जो बदलते मौसम के अनुरूप हों।
- जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों के द्वारा उत्पादन को काफी बड़ी मात्रा में बढ़ाया जा सकता है। इससे खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित कर लोगों को खाद्य असुरक्षा से मुक्त कराया जा सकता है।
- जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों से कम जमीन में ही अधिकतम उत्पादन को सम्भव बनाया जा सकता है। इसका लाभ किसानों को होगा क्योंकि इससे उनकी आय में बढ़ोत्तरी हो सकेगी।
- जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलें पर्यावरण के लिए हितकारी साबित हो सकती है, क्योंकि इन फसलों के लिए बहुत ही कम जमीन की आवश्यकता होती है अतः बढ़ती आबादी की जरूरतों के लिए वनों को काटने की जरूरत नहीं होगी।
- इन फसलों के द्वारा उत्पादन को काफी मात्रा तक बढ़ाया जा सकता है इससे बाजार में उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। बाजार में उत्पादों की समुचित उपलब्ध्ता से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी।
- सबसे बढ़कर जेनेटिक मॉडिफाइड फसलों से उत्पादों में विविधता आयेगी क्योंकि जेनेटिक इंजीनियरिंग के द्वारा फसलों के गुणों में आवश्यक एवं मनचाहे परिवर्तन किये जा सकेंगे।
- जेनेटिक इंजीनियरिंग विधि से ऐसी फसलों का विकास किया जा सकता है जो पानी की कम से कम खपत में तैयार हो सकती है तथा अत्यधिक तापमान का सामना कर सकती है। ऐसी फसलें वर्तमान समय की प्रमुख आवश्यकता बनकर उभरी हैं क्योंकि पानी की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है तथा तापमान बढ़ता जा रहा है।
जीन संविद्धर्त फसलों के विपक्ष में तर्क :
- जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों से यद्यपि उत्पादन को बढ़ाने में मदद मिली है किन्तु ये फसलें मानव स्वास्थ्य के लिए कितनी सुरक्षित है यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है। ब्राउन विश्वविद्यालय के द्वारा किये गये एक हालिया शोध में यह बात सामने आयी है कि इन फसलों में एलर्जी सम्बंधी समस्या पायी गयी है जो मानव के लिए हानिकारक है।
- जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों के उत्पादों को बीज के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक फसल के लिए नये बीज प्रयोग करने पड़ते है। इस प्रकार जेनेटिक मॉडिफाइड फसलें किसानों को पूर्णतः अपने ऊपर आश्रित बना लेती है। ज्ञातव्य है कि परम्परागत फसलों में किसान अपनी फसल के ही उत्पाद को बार-बार बीज के रूप में प्रयोग करते है।
- इन फसलों के बारे में ऐसा कहा जाता है कि ये कुछ स्थानीय पौधें एवं फसलों को हानि पहुँचा सकती है जिससे जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है।
- जेनेटिक मॉडिफाइड फसलों को उगाने में अत्यधिक मात्रा में पानी की जरूरत होती है। साथ ही इनमें विभिन्न प्रकार के कीटनाशकों का प्रयोग भी किया जाता है। इस प्रकार इन फसलों के विषय में जो सकारात्मक पक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है वह संदेह के घेरे में है।
- इन फसलों को लगातार उगाने से किसान अपनी परम्परागत फसलों के विषय में अनिच्छुक हो सकते है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि भविष्य में परम्परागत फसलों के विषय में किसी को कोई जानकारी ही नहीं होगी।
- जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों से कुछ नयी प्रकार की बीमारियाँ भी फैल सकती है। इसका कारण यह है कि इन फसलों को संविद्धर्त करने के लिए बैक्टीरिया एवं विषाणुओं का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार यह तथ्य निश्चित तौर पर इन फसलों को कटघरें में खड़ा करता है।
- जेनेटिक मॉडिफाइड फसलों के बीजों का पेटेण्ट होता है अतः जिस फसल के बीज पर जिस कम्पनी का पेटेण्ट होता है वह बीजों के लिए मनचाही कीमत वसूल कर सकती है।
- जेनेटिक मॉडिफाइड फसलों के उत्पादों को दैनिक जीवन में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। उदाहरण के तौर पर इन फसलों के उत्पादों को बेंचने वाले उत्पादकों को उच्च टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि स्थानीय प्रशासन इन उत्पादों पर अलग से टैरिफ आरोपित कर सकता है।
निष्कर्ष- निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यद्यपि जीन संविद्धर्त फसलों में बड़ी संभावना निहित है किंतु इसके स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों के विषय में वैज्ञानिक अभी एक मत नही हो सके हैं। इस कारण से जीन संविद्धर्त फसलों को व्यापक रूप में अपनाने से पहले इसके स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का आकलन आवश्यक होगा।