सूचना के अधिकार अधिनियम (2005) ने भारत में पारदर्शिता के एक नये युग का आगाज किया है। किंतु कुछ लोगों के द्वारा इसका दुरूपयोग भी किया जाता रहा है जिसके कारण इसके प्रभावी क्रियान्वयन में बाध आती है। सबसे बड़ी बाध वास्तविक एवं अवास्तविक याचिकाओं को अलग करने की है ताकि अवास्तविक याचिकाओं को नजरअंदाज कर वास्तविक याचिकाओं के समाधान की समुचित व्यवस्था की जा सके।
वास्तविक एवं अवास्तविक याचिकाओं को अलग करने के लिए मेरे द्वारा निम्नलिखित उपाय सुझाये जायेंगे-
- जो लोग दूसरों की ओर से याचिकायें दायर करते हैं उन याचिकाओं को कम महत्व प्रदान करना।
- जो लोग बार-बार याचिका दायर करते हैं उनकी याचिकाओं को कम महत्व प्रदान करना।
- जिन लोगों के द्वारा स्वयं के लिए याचिका दायर की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर ही आरटीआई का प्रयोग किया जाता है उनकी याचिकाओं को सर्वाधिक महत्व प्रदान करना।
मेरे द्वारा प्रस्तुत किये गये सुझावों के गुण एवं दोषों का आकलन निम्न प्रकार से है-
- जो लोग दूसरों की ओर से याचिकायें दायर करते हैं उन याचिकाओं को कम महत्व प्रदान करना।