ऐतिहासिक रूप में लड़कियों को शोषित वर्ग के रूप में लिया जाता रहा है। उन्हें कईं प्रकार के शोषण का सामना करना पड़ा। उदाहरण के तौर पर, लड़कियों के जन्म को हतोत्साहित किया जाना, उन्हें शिक्षा से वंचित किया जाना तथा उन्हें पैतृक संपत्ति से पृथक रखना आदि।
लगभग सम्पूर्ण प्राचीन काल एवं मध्यकाल के इतिहास में बालिकायें एवं महिलायें वंचित एवं तिरस्कृत रही। इसलिए आधुनिकता के आगमन के पश्चात् महिला सशक्तीकरण हमारी पहली प्राथमिकता बन गयी। सशक्तीकरण की इस प्रक्रिया में हमने आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक आदि सभी प्रकार के सशक्तीकरण की बात कही किंतु हमारे लिए सशक्तीकरण का अर्थ महिलाओं को पुरूष जीवन के अनुकूल बनाना मात्र रहा अर्थात् महिलाओं को सीमित अधिकार प्रदान किये गये और उन्हें पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की अनुमति नहीं दी गयी। महिलाओं को केवल घर की जिम्मेदारी के अनुकूल ही माना गया।
यदि कभी किसी महिला ने साहस जुटाकर सार्वजनिक जीवन में काम करने का फैसला किया भी तो पुरूष वर्ग के द्वारा उसका न सिर्फ विरोध किया जाता है बल्कि किसी भी प्रकार से सहयोग भी नहीं किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, महिलायें सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने के साथ-साथ घरेलू उत्तरदायित्वों का निर्वहन भी करती हैं। यह सिलसिला वर्तमान समय में भी बदस्तूर जारी है। इस प्रकार आधुनिकता के आगमन के साथ महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए जो आशा की गयी थी वह लगभग निराधार ही साबित हुई है।
भारत में ऐतिहासिक काल में सार्वजनिक जीवन और निजी जीवन दोनों के बीच स्पष्ट भेद करके रखा गया। फिर न केवल उच्च वर्ग एवं निम्न वर्ग के बीच बल्कि पुरूषों एवं महिलाओं के बीच भी श्रम विभाजन की पद्धति अपनायी गयी अर्थात् सार्वजनिक जीवन में केवल पुरूषों को प्रवेश दिया गया था जबकि महिलाओं को इससे वंचित रखा गया। महिलाओं की गतिविधि को महज निजी जीवन तक सीमित कर दिया गया था अर्थात् महिलाओं को घर-परिवार की देखरेख करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी जबकि पुरूषों को सार्वजनिक जीवन में जाकर आय अर्जित करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी।
आधुनिक काल और विशेषकर उत्तर-आधुनिक काल में एक प्रकार का लैंगिक समानता आंदोलन शुरू हो गया। इसे प्रेरित करने में मानवतावादी, समाजवादी एवं महिलावादी चिंतकों की विशेष भूमिका रही है। इनके नारे थे- ‘महिला समानता एवं महिला सशक्तीकरण।’ इस क्रम में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया, यह कदम था ‘संवैधानिक स्तर पर महिलाओं को समान स्तर प्रदान करना तथा सार्वजनिक जीवन का क्षेत्र महिलाओं के लिए खोल दिया जाना।’
अब महिलायें पुरूषों के समान स्वतंत्र रूप से सार्वजनिक जीवन में हिस्सा ले सकती थी। इस कदम को एक महान सामाजिक क्रांति के रूप में देखा गया तथा चारों ओर इस कदम की प्रशंसा की गयी। सामाजिक सुधारक से लेकर नेताओं तक ने महिला सशक्तीकरण की इस उपलब्धि् का दावा किया।
किंतु आगे आने वाले समय ने यह सिद्ध कर दिया कि तथाकथित लैंगिक समानता का आंदोलन एक अधूरा एजेण्डा मात्र था। महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में प्रवेश तो मिला था किंतु निजी जीवन में उनके दायित्वों में किसी भी प्रकार की कटौती नहीं हुई थी।
महिलायें जब सार्वजनिक जीवन से लौटती तो उन्हें घर पर एक पत्नी, एक माँ और एक बहू का दायित्व पूरा करना पड़ता था। महिलाओं के लिए सार्वजनिक जीवन एवं निजी जीवन दोनों का दायित्व पूरा करना एक बड़ी चुनौती बन गयी। महिलायें सार्वजनिक जीवन एवं निजी जीवन के बीच पिसने लगी।
ऐसी स्थिति में सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के प्रदर्शन में नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगा। इस नकारात्मक प्रभाव में उनके रोजगार एवं अन्य उपलब्ध् अवसरों को भी प्रभावित किया। हाल के शोधें से ज्ञात होता है कि कामकाजी समूह ;स्ंइवनत वितबमद्ध में महिलाओं की भागीदारी 37 प्रतिशत से घटकर 29 प्रतिशत हो गयी है।
इस बात का पफायदा उठाकर कुछ पितृसत्तावादी चिंतकों ने यह सिद्ध करने का भी प्रयास किया है कि जीव विज्ञान एवं समाजशास्त्राीय आधार पर महिलायें पुरूषों की तुलना में कमजोर है किंतु यहाँ सवाल उठता है कि श्रेष्ठता एवं हीनता की कसौटी क्या है?
क्या वह अधिक श्रेष्ठ नहीं है जो निजी जीवन में अपने दायित्वों को पूरा करते हुए भी सार्वजनिक जीवन में भी अपनी मौजूदगी को बनाये हुए हैं और वे हैं महिलायें। एक तरफ घर पर उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे एक आदर्श माँ, आदर्श पत्नी एवं आदर्श बहू की भूमिका निभायें वहीं दूसरी ओर उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे सार्वजनिक जीवन में भी अपने दायित्वों का निर्वहन करें।
यदि भारत के समानांतर हम पश्चिमी देशों में महिलाओं की स्थिति को देखते हैं तो पिफर हम पाते हैं कि पश्चिमी देशों में जैसे-जैसे सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती गयी वैसे-वैसे निजी जीवन में उनकी भूमिका सीमित होती गयी। इसका सीध प्रभाव उनकी उत्पादकता पर पड़ा जिससे वे सार्वजनिक जीवन में बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रही। वहीं भारत में महिलाओं की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।
यही कारण है कि आज भी महिलाओं को सार्वजनिक जीवन के साथ-साथ निजी जीवन के दायित्वों को पूरा करना पड़ रहा है। यदि हम सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के प्रदर्शन को सुधारना चाहते हैं तो हमें निजी जीवन में पुरूषों की भागीदारी को बढ़ाना होगा अर्थात् पुरूषों को आगे आकर घरेलू जीवन में महिलाओं का सहयोग करना होगा।
महिलाओं को यह स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए कि वे अपने कैरियर एवं बच्चों आदि से संबंधित निर्णय स्वयं ले सके। तभी जाकर महिला सशक्तीकरण संभव होगा।
किंतु इन परिवर्तनों के लिए पितृसत्तावादी दृष्टिकोण को तिलांजलि देनी होगी तथा महिला एवं पुरूष के बीच सभी प्रकार के भेदभावों को समाप्त करना होगा। एक ओर जहाँ निजी एवं घरेलू जीवन में पुरूषों के दायित्वों को बढ़ाना होगा वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओं को पूरी स्वायत्तता प्रदान करनी होगी। साथ ही पूरे समाज को मिलकर महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने के लिए एक ईमानदार प्रयास करना होगा। तभी जाकर भारतीय कामकाजी महिला एक न्यायोचित बर्ताव प्राप्त कर सकेगी।