स्मॉग की समस्या कारण, प्रभाव एवं निदान

हाल के समय में स्मॉग एक बड़ी पर्यावरणीय समस्या के रूप में सामने आया है। दरअसल स्मॉग (Smog) एक प्रकार का वायु प्रदूषक है जो दो शब्दों धुआँ (Smoke) तथा कोहरा (Fog) से मिलकर बना है। वस्तुतः स्मॉग धूल, धुआँ तथा कुहासे का मिश्रण है। परिवहन के विभिन्न साधनों, औद्योगिक कारखानों से निकलने वाले धुएँ में मौजूद सल्फर, राख, धूल-कण तथा कूड़ा-करकट एवं पराली आदि को जलाने से निकलने वाला धुआँ जब कोहरे में मिल जाता है तो स्मॉग का निर्माण होता है।

            स्मॉग शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग करने का श्रेय वर्ष 1905 में डॉ. हेनरी अंतोइन दे वू (Dr. henry Antoine des voeux)  को दिया जाता है। इन्होंने धुएँ और कोहरे की मिश्रित अवस्था को स्मॉग का नाम दिया।

            जब हम स्मॉग की बढ़ती समस्या के कारणों पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि इसके लिए मानवीय गतिविधियाँ ही प्रमुख रूप से उत्तरदायी हैं। मानव के द्वारा जिस प्रकार से कार्बन को अवशोषित करने वाले वनों को काटा जा रहा है और अधिकाधिक रूप में परिवहन के नये-नये साधनों का प्रयोग किया जा रहा है, उससे स्मॉग की समस्या काफी गंभीर होती जा रही है।

            इसी प्रकार पर्यावरण में खुले तौर पर कूड़ा-करकट को जलाना तथा धन की फसल के पश्चात् खेतों में ही पराली को जलाकर नष्ट कर देना इस समस्या को और भी अधिक बढ़ा देती है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में ‘राष्ट्रीय हरित          प्राधिकरण’ के द्वारा खुल में कूड़ा आदि जलाने पर रोक लगा दी गयी है।

            हाल ही में नासा (NASA) के उपग्रहों से प्राप्त चित्र से पता चलता है कि स्मॉग की यह समस्या केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तक ही नहीं सीमित है बल्कि यह पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से से लेकर बिहार एवं बंगाल की सीमा तक विस्तृत है। सर्दियों के महीने में स्मॉग की समस्या काफी गंभीर स्वरूप धारण कर लेती है तथा मानव जीवन एवं पर्यावरण को विभिन्न प्रकार से हानि पहुँचाती है।

            यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि आखिर सर्दियों के समय में ही स्मॉग की समस्या गंभीर स्वरूप क्यों धारण कर लेती है? दरअसल बरसात के महीने में वातावरण में मौजूद नमी के साथ उपस्थित पर्यावरणीय प्रदूषक भी वर्षा की बूंदों के साथ नीचे आ जाते हैं जिससे वातावरण काफी स्वच्छ हो जाता है। किंतु जैसे-जैसे मानसून वापस लौटता है और सर्दियों का मौसम शुरू होता है तो पर्यावरण में पुनः इन प्रदूषकों की उपस्थिति काफी बढ़ जाती है। पटाखों के प्रयोग तथा पराली आदि जलाने से वायु प्रदूषकों में काफी वृद्धि हो जाती है। इनके कारण भी स्मॉग की समस्या की गंभीरता में बढ़ोत्तरी होती है।

            स्मॉग के कारणों को जानने के पश्चात् हमारे लिये यह जानना जरूरी हो जाता है कि स्मॉग मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को किस प्रकार से प्रभावित करता है? दरअसल स्मॉग में विभिन्न प्रकार के वायु प्रदूषक मसलन कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों के अतिरिक्त धुआँ, धूलकण, पार्टिकुलेट मैटर आदि शामिल होते हैं।

            ये वायु प्रदूषक मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचाते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड तथा कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसें मनुष्य के श्वसन तंत्र को सीधे प्रभावित करती है जिससे फेफड़ों की कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है। कार्बन मोनोऑक्साइड फेफडों के माध्यम से रक्त परिसंचरण में मिल जाती है और रक्त के द्वारा ऑक्सीजन लेने की क्षमता को कम कर देती है। इसी प्रकार सल्फर डाइऑक्साइड आँखों में जलन पैदा करने वाली गैस है। अस्थमा के मरीजों के लिए तो यह गैस अत्यंत ही खतरनाक है।

            वायु प्रदूषण के कारण वैश्विक स्तर प्रतिवर्ष 20 लाख लोगों की मौत होती है। भारत के कुछ महानगरों को विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित नगरों में शामिल किया जाता है। हालाँकि सरकार एवं न्यायालयों के द्वारा वायु प्रदूषण की समस्या को प्रमुख रूप से रखा जा रहा है किंतु स्थिति में अधिक परिवर्तन नहीं आ सका है। ज्ञातव्य है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को बेहतर स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल, प्रदूषण मुक्त वातावरण प्रदान करने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा भी इस बात की पुष्टि की गयी है। उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ तथा वेल्लोर सिटीजन बनाम भारत संघ जैसे मामलों में स्वच्छ पर्यावरण एवं वायु मंडल को मनुष्य के मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया है।

वायु प्रदूषकों में पार्टिकुलेट मैटर का भी प्रमुख स्थान है। पार्टिकुलेट मैटर में 2.5 तथा 10.0 आकार के कण काफी हानिकारक होते हैं। पार्टिकुलेट 2.5 से तात्पर्य ऐसे कणों से है जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या इससे कम होता है। ये इतने छोटे होते हैं कि इन्हें इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से ही देखा जा सकता है। ये कण हृदय एवं फेफड़ों की जानलेवा बीमारी का कारण बनते हैं।

इसी प्रकार पार्टिकुलेट मैटर 10.0 से तात्पर्य ऐसे सूक्ष्म कणों से है जिनका व्यास 2.5 से लेकर 10.0 माइक्रोमीटर तक होता है। ये कण भी मानव स्वास्थ्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाते हैं। इन कणों के प्राथमिक स्रोत सड़कों पर चलने वाले वाहनों से उड़ने वाली धूल तथा निर्माण कार्य आदि से उत्पन्न धूल हैं।

            स्मॉग में विद्यमान वायु प्रदूषक पर्यावरण को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाते हैं। उदाहरण के तौर पर, डीजल से सल्फर डाइऑक्साइड उत्पन्न होती है और यह सल्फर डाइऑक्साइड अम्ल वर्षा का प्रमुख कारक होती है। इसी प्रकार अत्यधिक मात्रा में उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है। इससे जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुँचता है।

            स्मॉग के कारणों तथा इसके द्वारा उत्पन्न समस्याओं को जानने के पश्चात् यह मानव समुदाय की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह इस समस्या के निदान के लिए कदम उठायें। स्मॉग की समस्या से निपटने के लिए हमें वायु प्रदूषण में कमी लानी होगी।

            वायु प्रदूषण में कमी लाने के लिए बड़े पैमाने पर यातायात सुधार लागू करना होगा तथा सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना होगा। कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड तथा कार्बन मोनोऑक्साइड आदि पर नियंत्रण स्थापित करना होगा। सबसे बढ़कर पार्टिकुलेट मैटर 2.5 एवं 10.0 को भी नियंत्रित करना होगा। 

            वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सीएनजी तथा इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रसार करना होगा तथा ‘ऑड-इवेन’ जैसे फार्मूले को पूरे देश में स्थायी रूप से लागू किया जाना चाहिए। इसी प्रकार कूड़ा-करकट एवं पराली जलाने की समस्या का भी निदान करना होगा। इस संबंध में हाल ही में एनटीपीसी के द्वारा महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। ज्ञातव्य है कि एनटीपीसी किसानों से एक निश्चित दर पर पराली की खरीद करेगा तथा इसका उपयोग अपने विद्युत उत्पादन केन्द्रों में करेगा।

            यदि हमने उत्साहपूर्वक एवं ईमानदारी से उपर्युक्त कदमों को उठाया तो निश्चित तौर पर वायु प्रदूषण की समस्या को काफी हद तक दूर किया जा सकेगा। किंतु यदि हमने लापरवाही बरती तो पृथ्वी का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है। इसका खामियाजा न सिर्फ वर्तमान पीढ़ी को बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी भुगतना होगा।
Posted on by