वर्णों को दो भागों में बँटा गया हैं-
1- स्वर वर्ण
2- व्यंजन वर्ण
स्वर वर्ण/अक्षर : स्वर उन वर्णों या अक्षरों को कहते है, जिनका उच्चारण बिना किसी अवरोध के होता है, इनके उच्चारण में किसी दूसरे वर्ण/अक्षर की सहायता नहीं ली जाती है यानि इनके उच्चारण में भीतर से आती हुई वायु आबाध गति से निकलती है। सामान्यतः इनके उच्चारण में कण्ठ और तालु का प्रयोग होता है, जीभ और ओष्ठ का नहीं।
स्वर वर्णों को चार भागों में बँटा गया हैं-
1. ह्रस्व स्वर : ये स्वर मूल स्वर या एक मात्रिक स्वर कहलाते है, इनकी उत्पत्ति दूसरे स्वरों से नहीं होती, इनके उच्चारण में एक मात्रा का समय लगता है। जैसे-अ, इ, उ, ऋ।
2. दीर्घ स्वर : किसी मूल स्वर अथवा ह्रस्व स्वर को उसी स्वर से मिलाने पर जो स्वर बनते है, उन्हें दीर्घ स्वर कहते है। आ=अ+अ, ई=इ+इ, ऊ= उ+उ
3. संयुक्त स्वर : दो भिन्न प्रकृति (विजातीय स्वरों) के मिलने से जो स्वर बनते है, उन्हें संयुक्त स्वर कहते है। जैसे- ए=अ+इ, ऐ=अ+ए, ओ=अ+उ, औ=अ+ओ
4. प्लुत स्वर : जिस स्वरों के उच्चारण में तिगुना समय लगता है उसे प्लुत स्वर कहते है, इसके लिए तीन की संख्या (अंक) का प्रयोग किया जाता है। जैसे-ओऽम, राऽम। प्रायः इसका प्रयोग संस्कृत भाषा में सम्बोधन के अर्थ में किया जाता है। इसे त्रिमात्रिक स्वर भी कहते है।
नोट : एक मात्रा का समय लगने के कारण ह्रस्व स्वर को एक मात्रिक स्वर, दो मात्राओं के समय लगने के कारण दीर्घ स्वर को द्विमात्रिक स्वर तथा तीन मात्राओं के समय लगने के कारण प्लुत स्वर को त्रिमात्रिक स्वर कहते है।