हाल ही में आईवीआरआई (Indian Veterinary Research Institute) के वैज्ञानिकों को डी-सेल्युराइजेरान तकनीकी में आरम्भिक सफलता प्राप्त हुयी है। इसके तहत वैज्ञानिकों ने भैंस के मांस से लिए गये ऊतकों की मदद से चूहे के घाव को सफलतापूर्वक भर दिया। इससे भविष्य में मनुष्यों के लिए भी इस विधि के प्रयोग की संभावना उत्पन्न हुयी है।
क्या है डी-सेल्युराइजेशन तकनीक?
- डी-सेल्युराइजेशन तकनीकी को कोशिका रहित तकनीकी भी कहा जाता है।
- इस तकनीकी के तहत किसी जानवर या मनुष्य के शरीर से लिए गये मांस को कोशिका रहित (डी-सेल्युराइज्ड) किया जाता है।
- इस डी-सेल्युराइज्ड मांस से डीएनए, आरएनए तथा कोशिका द्रव्य आदि को अलग कर दिया जाता है।
- इस प्रक्रिया के पश्चात् मांस में केवल कोशिका रहित रूमेन जाल (कोलेजन टिश्यू) ही शेष बचता है।
- अब इस रूमेन जाल (कोलेजन टिश्यू) को किसी अन्य जन्तु या मनुष्य के घाव को भरने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
- समस्त प्रक्रिया में स्टेम सेल की अहम भूमिका होती है। जबकि दूसरे शरीर से लिए गये कोलेजन टिश्यू को एक आधर के रूप में प्रयोग किया जाता है।
- जिस शरीर का घाव भरना होता है उसकी कुछ स्टेम सेल एकत्रित कर इस कोलेजन टिश्यू में डाली जाती हैं।
- स्टेम सेल की यह विशेषता होती है कि वह प्रयोगशाला की बाहरी परिस्थितयों में ही पूर्ण कोशिकाओं का निर्माण शुरू कर देती है।
डी-सेल्युराइजेशन तकनीकी से प्राप्त होने वाले प्रमुख लाभ
- डी-सेल्युराजेशन तकनीकी से प्राप्त किये गये कोलेजन टिश्यू का प्रयोग किसी भी जीव के घाव को भरने के लिए किया जा सकता है।
- इस तकनीकी के माध्यम से जानवरों के मांस से निकाले गये कोलेजन टिश्यू का प्रयोग इंसान के घावों को भरने के लिए किया जा सकेगा जो अहम साबित होगा।
सबसे बढ़कर इससे मधुमेह जैसे रोग से पीड़ित लोगों के घाव तेजी से भरे जा सकेंगे। ज्ञातव्य है कि मधुमेह रोग से पीड़ित व्यक्ति के घाव को भरने में काफी लम्बा समय लग जाता