आकांक्षा:- वाक्य में एक शब्द या पद का उच्चारण सुनने के बाद दूसरे पद या शब्द का उच्चारण सुनने की इच्छा आकांक्षा कहलाती है।
जैसे-रात में जागता है। (गलत) आकांक्षा की पूर्ति न करने के कारण यह वाक्य गलत है। जैसे-इसके स्थान पर यह लिखते है कि-चैकीदार या पहरेदार रात में जागता है। (सही) यह वाक्य चैकीदार या पहरेदार शब्द सुनकर (या इनके प्रयोग से) आकांक्षा की निवृत्ति होती है।
योग्यता : शब्दों के अर्थ बोध का सामथ्र्य योग्यता कहलाता है। जब वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द अर्थबोध कराने में सहायक बने, तो यह योग्यता कहलाता है। जैसे- चिड़िया पैरों के सहारे उड़ती है। (गलत)
ध्यान रहे कि पैरों के सहारे चला जाता है, उड़ा नहीं जाता। उपर्युक्त वाक्य के स्थान पर यह लिखा जाना चाहिए-चिड़िया परो के सहारे उड़ती है। (सही) ।
क्रम : वाक्य में शब्दों के विधिवत् विन्यास (गठन) को क्रम कहते है। जैसे-पढ़ी मैने एक किताब (गलत), मैंने एक किताब पढ़ी। (सही)।
वाक्य प्रायः पदों (शब्दों) और पदबन्धों (शब्द समूहों) से बनता है।
पदबन्ध: डाॅ0 हरदेव बाहरी ने अपनी पुस्तक ‘व्यवहारिक हिन्दी’ में पदबन्ध को परिभाषित करते हुए लिखा है- ”वाक्य के उस भाग को जिसमें एकाधिक पद (शब्द) परस्पर सम्बन्ध होकर अर्थ को देते है किन्तु पूरा अर्थ नहीं देते“
”पदबन्ध, शब्दसमूह या वाक्यांश कहलाते है।“
इस परिभाषा से तीन महत्त्वपूर्ण बाते स्पष्ट होती है-
1. पदबन्ध में एकाधिक पद होते है।
2. पदबन्ध परस्पर सम्बन्ध होकर एक इकाई बना लेते है।
3. पदबन्ध किसी वाक्य के अंश/अंग होते है, पूर्ण वाक्य नहीं होते है।