योजक चिह्न (-):
हिन्दी में अल्प विराम के बाद योजक चिह्न का अत्याधिक प्रयोग होता है। भाषा विज्ञान की दृष्टि से हिन्दी की प्रकृति विश्लेषणात्मक है संस्कृत की भाँति संश्लेषणात्मक नही।
इसलिए हिन्दी में सामासिक शब्दों या पदों का अधिक प्रयोग नही होता, जबकि संस्कृत में ऐसे पदो या शब्दों का प्रयोग बहुतायत होता है। प्रायः संस्कृत में योजक चिह्न (-) का प्रयोग नहीं होता है।
नोट: योजक चिह्न के उचित प्रयोग न करने पर उच्चारण और अर्थगत भ्रम सम्भव है।
कुशासन (क्रम से बना आसन)
कु-शासन (बुरा शासन)
भूतत्त्व (भूत शब्द का भाववाचक संज्ञा रूप)
भू-तत्व (भूमि या पृथ्वी से सबद्ध तत्त्व)
उपमाता (उपमा देने वाला)
उप-माता (सौतेली माता)
योजक चिह्न के प्रयोग की निम्नलिखित स्थितियाँ है-
1. योजक चिह्न सामान्यतः दो शब्दों को जोड़कर एक समस्त पद बनाता है, लेकिन दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रहता है। जैसे-दाल-रोटी, घर-द्वार, भाई-बाप, फल-फूल।
2. विपरीतार्थक शब्दों के बीच भी योजक चिह्न लगाया जा सकता है।
3. द्वन्द्व समास के ऐसे पद जिनके अर्थ समाए होते है तथा वे बोलचाल में प्रयुक्त होते है ऐसे पदों के बीच योजक चिह्न लगाया जाता है। जैसे-हाट-बाजार, मान-मर्यादा, भोग-विलास, सेठ-साहूकार, बल-वीर्य, भूल-चूक, लेनी-देनी।
4. जब दो शब्दों में से एक साथ्र ओर दूसरा निरर्थक हो तो उनके बीच योजक चिह्न लगता है। जैसे- पानी-बानी, झूठ-मूठ, खाना-पाना।