विभिन्न धर्मों से सम्बंधित पर्सनल लॉज (Personal Laws) के विषय में आप क्या जानते हैं, सविस्तार स्पष्ट कीजिए? यद्यपि त्रिपल तलाक के सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ केन्द्र सरकार के द्वारा सराहनीय प्रयास किये जा रहे हैं किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ में भी सुधार जरूरी हैं क्या आप सहमत हैं? क्या समान नागरिक संहिता को लागू किया जाना जरूरी हैं?

पर्सनल लॉज (Personal Laws) विभिन्न धर्मो एवं विश्वासों पर आधारित होते हैं। ज्ञातव्य है कि विभिन्न धर्मों के लोग मसलन हिंदू, मुस्लिम ईसाई एवं पारसी आदि अपने स्वयं के पर्सनल लॉ से शासित होते हैं। उदाहरण के तौर पर हिंदू समुदाय हिंदू विधि अधिनियम (1955-56) मुस्लिम समुदाय मुस्लिम विधि (शरीयत) अधिनियम 1937, ईसाई समुदाय ईसाई विधि तथा पारसी समुदाय पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम 1936 के द्वारा शासित हैं।

पर्सनल लॉ अपने -अपने धर्म से सम्बंधित लोगों के जीवन को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसका कारण यह है कि प्रत्येक धर्मानुयायी को परिवार संबंधी मामलों तथा विवाह, तलाक उत्तराधिकार एवं गोद लेने जैसे मामलों में पर्सनल लॉ के तहत निर्धारित मानदण्डों का ही पालन करना पड़ता है।

क्या मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार आवश्यक है।

  • यद्यपि हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा त्रिपल तलाक की प्रथा को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया है किंतु जब तक मुस्लिम पर्सनल लॉ पर आधारित निम्न प्रथाओं को समाप्त नहीं कर दिया जाता तब तक मुस्लिम  महिलाओं की स्थिति में वास्तविक सुधार असम्भव है।
  • मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहुविवाह को अनुमति प्रदान की गयी है। बहुविवाह की यह प्रथा महिला अधिकारों के विरुद्ध एवं अन्यायपूर्ण है।
  • मुस्लिम पर्सनल लॉ में दूसरी बुराई निकाह हलाला की है। निकाह हलाला के तहत एक महिला को पूर्व पति के पास लौटने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह करना होता है।
  • मुस्लिम पर्सनल लॉ में न तो मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने का अधिकार दिया गया है और न उत्तराधिकार का। इस व्यवस्था को बदलकर मुस्लिम महिलाओं को भी पुरूषों के समान अधिकार प्रदान किये जाने की आवश्यकता है।
  • सबसे बढ़कर मुस्लिम पर्सनल लॉ में बालिकाओं की शिक्षा पर समुचित ध्यान नहीं दिए जाने तथा बाल विवाह को प्रोत्साहित करने की व्यवस्था हैं ये व्यवस्थायें महिला अधिकारों के पूर्णतः प्रतिकूल हैं।

क्या समान नागरिक संहिता को लागू कर दिया जाना चाहिए?

  • भारतीय संविधन के अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता का प्रावधान किया गया है किंतु संविधान लागू होने के 67 वर्षों के बाद भी इसे लागू नहीं किया जा सका है।
  • 21 वीं सदी के भारत को यदि शेष विश्व के साथ कदमताल करते हुए आगे बढ़ना है तो हमें रूढ़ियों एवं अन्धविश्वास को त्यागकर खुले मन से संविधान के आदर्शों अर्थात् समान नागरिक संहिता को शीघ्रातिशीघ्र अपनाना होगा।
  • किंतु भारतीय परिवेश को देखते हुए एक बार में ही समान नागरिक संहिता लागू करने के स्थान पर क्रमिक रूप से लागू करना उचित कदम होगा।

निष्कर्षः- निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में वास्तविक सुधार के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार की जरूरत है। साथ ही देश में समान नागरिक संहिता को लागू करना जरूरी है किंतु इसे क्रमिक रूप से लागू करना होगा।

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