हाल ही में सेंसरशिप का मुद्दा काफी चर्चा में रहा है, स्पष्ट कीजिए। भारत में सेंसरशिप की क्रियाकलाप के बारे में बताइए। सेंसरशिप को हानिकारक क्यों माना जाता है? साथ ही बताइए कि यदि सेंसरशिप को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया जाये तो उससे किस प्रकार के नुकसान सामने आ सकते हैं?

हाल के समय में सेंसरशिप का मुद्दा काफी चर्चा में रहा है। एक ओर जहाँ स्वतंत्र अभिव्यक्ति के पक्षध्र सेंसरशिप का विरोध कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर कुछ लोग सेंसरशिप को जरूरी मानते हैं क्योंकि सेंसरशिप के बिना घृणास्पद कथनों का प्रसार कर या इतिहास को तोड़ - मरोड़कर प्रस्तुत करके जनता की भावनाओं को उकसाया जा सकता है। हाल ही में फिल्म पद्मावती को लेकर एक बड़ा विवाद उत्पन्न हुआ। जिससे देश में सेंसरशिप को लेकर नयी बहस शुरू हुयी।

भारत में सेंसरशिप की क्रियाविधि:

  • भारत में फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को सेंसर बोर्ड (CBFC) के द्वारा नियंत्रित किया जाता है। सेंसर बोर्ड की स्वीकृति के पश्चात् ही किसी फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता है।
  • केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड या सेंसर बोर्ड एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) है जो भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रलय के तहत कार्य करता है।
  • केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1952 के अंतर्गत निर्धारित प्रावधानों के अनुसार नियंत्रित करता है।

सेंसरशिप को हानिकारक क्यों माना जाता है?

  • सेंसरशिप स्वतंत्र अभिव्यक्ति के सम्बंध में एक भय का माहौल सृजित करता है। इसके कारण रचनात्मक अभिव्यक्ति में भी रूकावट आती है।
  • सेंसरशिप के कारण किसी एक मुद्दे का केवल एक ही पक्ष सामने आ पाता है जबकि वास्तव में उसके कई अन्य पक्ष भी हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि कोई फिल्म निर्माता किसी ऐतिहासिक घटना के अन्य पक्षों को प्रस्तुत करना चाहता है तो उस पर ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाकर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।
  • सेंसरशिप के कारण किसी एक स्टेटमेंट को ही सत्य मान लिया जाता है जिससे उसके अन्य आयामों पर चर्चा ही नहीं हो पाती इससे वास्तविक सत्य छिपा ही रह जाता है।

यदि सेंसरशिप को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाये तो उससे उत्पन्न होने वाली हानियाँ:

  • यदि सेंसरशिप को पूर्णतः समाप्त कर दिया जाये तो उससे अभिव्यक्ति अनियंत्रित हो जायेगी। स्वतंत्र अभिव्यक्ति के नाम पर लोग घृणास्पद कथनों का प्रसार कर सकते हैं।
  • स्वतंत्र अभिव्यक्ति के नाम पर समाज विरोधी तथ्यों के द्वारा जनभावनाओं को भड़काने वाली सूचनायें एवं चित्र प्रसारित किये जा सकते हैं जिससे कानून एवं व्यवस्था के लिए चुनौती उत्पन्न हो सकती है।
  • सबसे बढ़कर सेंसरशिप के अभाव में बिना किसी उत्तरदायित्व के ऐतिहासिक घटनाओं से छेड़छाड़ की जा सकती है जिससे समाज में हिंसा जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। जैसा कि हाल ही में पद्मावती फिल्म के दौरान राजपूत समुदाय हिंसा पर उतर आया था।

निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सेंसरशिप आवश्यक है किंतु इसके पीछे समुचित तर्क एवं प्रमाण होने चाहिए। बिना किसी वैध कारण के यदि सेंसरशिप का प्रयोग किया जायेगा तो उससे स्वतंत्र एवं रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए समस्या उत्पन्न हो सकती है।

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