दिसम्बर 2017 में अर्जेण्टीना की राजधनी ब्यूनर्स आयर्स में विश्व व्यापार संगठन की 11वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस बैठक में विश्व व्यापार संगठन के सभी 164 सदस्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। यद्यपि इस बैठक को काफी अहम माना जा रहा था किंतु सार्वजनिक भंडारण के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका के अड़ियल रवैये के कारण अंततः कोई सहमति नहीं बन सकी। ज्ञातव्य है कि अमेरिका भारत को छूट प्रदान करने के लिए तैयार नहीं है। दूसरी ओर भारत का मानना है कि उसे अपनी गरीब आबादी का पेट भरने के लिए अनुमति प्रदान की जाये।
विश्व व्यापार संगठन में भारत का पक्ष क्या है?
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के अनुसार कोई भी देश अपने कुल खाद्यान्न उत्पादन के 10 प्रतिशत के बराबर ही खाद्य सब्सिडी प्रदान कर सकता है किंतु भारत को अपने खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत काफी अधिक खाद्य सब्सिडी प्रदान करनी पड़ती है।
- उल्लेखनीय है कि देश में 60 करोड़ से अधिक लोग खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के दायरे में आते हैं। 60 करोड़ लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सरकार के पास खाद्यान्नों का एक बड़ा भण्डार होना जरूरी है। खाद्यान्नों के इसी भण्डार के लिए भारत सरकार को सब्सिडी देनी पड़ती है।
- वर्तमान में विश्व व्यापार संगठन के दोहा दौर के तहत ‘पीस क्लॉज’ (Peace clause) की सुविधा मौजूद है। ज्ञातव्य है कि ‘पीस क्लॉज’ में यह प्रावधान किया गया है कि यदि कोई देश कुछ समय तक विश्व व्यापार संगठन के द्वारा निर्धारित 10 प्रतिशत से अधिक सब्सिडी प्रदान करता है तो उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।
विश्व व्यापार संगठन में भारत एवं अमेरिका के बीच किन मामलों में मतभिन्नता है?
- अमेरिका का मानना है कि खाद्यान्न भंडारण के सम्बंध में भारत को कोई विशेष छूट नहीं प्रदान की जानी चाहिए जबकि भारत का मानना है कि 60 करोड़ से अधिक लोगों के लिए लागू खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के लिए उसे विशेष छूट प्रदान की जानी चाहिए।
- अमेरिका ई-कॉमर्स तथा निवेश सुविधा (Investment Facilitation) पर भी विकासशील देशों से छूट चाहता है जबकि भारत ने विकासशील देशों की ओर से अमेरिका की इस माँग पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की है।
निष्कर्षः- निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि विश्व व्यापार संगठन के 11वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में कोई सहमति नहीं बन सकी। सहमति न बनने का प्रमुख कारण विकसित एवं विकासशील देशों के द्वारा अपनी-अपनी माँगों पर अडिग रहना रहा।