सूचना के अधिकार अधिनियम को पारदर्शी एवं उत्तरदायी प्रशासन की स्थापना में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। भारत सरकार के द्वारा इसमें कौन से संशोधनों का प्रस्ताव रखा गया है? भारत सरकार के द्वारा प्रस्तावित संशोधनों को लागू करने से सूचना के अधिकार अधिनियम में क्या प्रभाव पड़ेगा?

पारदर्शी एवं उत्तरदायी प्रशासन की स्थापना की दिशा में सूचना के अधिकार अधिनियम को महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। इस अधिकार के माध्यम से नागरिक सरकारी विभागों से सम्बंधित और उनके द्वारा क्रियान्वित कार्यों के विषय में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

हाल ही में भारत सरकार के द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम में कुछ संभावित संशोधनों का प्रस्ताव रखा गया है जिनके लागू होने पर निश्चित तौर पर सूचना के अधिकार अधिनियम में कमजोरी आयेगी तथा सूचना के अधिकार कार्यकर्ता हतोत्साहित हो सकते हैं।

सूचना के अधिकार अधिनियम में भारत सरकार के द्वारा संभावित संशोधन

  • सूचना चाहने वाले प्रार्थी के पास अपनी स्थिति को स्पष्ट करने के समर्थन में समुचित साक्ष्यों का होना आवश्यक होगा।
  • अपील के लिए प्रार्थना पत्र एवं शिकायत को अलग-अलग करने का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है।
  • यदि किसी अपीलकर्ता की मृत्यु हो जाती है तो उसकी अपील उसी समय से समाप्त मानी जायेगी तथा उस पर कोई कार्यवाही नहीं की जायेगी।
  • सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत एक भाषा नीति को अपनाने का प्रस्ताव भी सामने रखा गया है जिसके तहत प्रार्थना पत्र या तो हिंदी या फिर अंग्रेजी भाषा में ही स्वीकार किये जायेंगे।
  • प्रस्तावित संशोधनों में कहा गया है कि यदि पीआईओ(PIO) के ऊपर शिकायत की जाती है तो शिकायत के साथ पीआईओ के पास दाखिल की गयी शिकायत की कॉपी का होना जरूरी होगा।

प्रस्तावित संशोधनों से सूचना के अधिकार अधिनियम में क्या प्रभाव पड़ेगा?

• यदि शिकायत करने वाले या सूचना चाहने वाले व्यक्ति को अपनी पहचान के प्रमाण पत्र दाखिल करने होंगे तो इससे प्रार्थी की जान को खतरा हो सकता है। ज्ञातव्य है कि देश में कई आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है।

• इसी प्रकार यदि अपील करने वाले व्यक्ति की मृत्यु पर अपील को समाप्त मान लिया जायेगा तो विरोधी अपीलकर्ता प्रार्थी के जीवन के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते हैं।                   

• प्रस्तावित संशोधनों में एक भाषा नीति को अपनाने की बात भी कही गयी हैं जो ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।

• सबसे बढ़कर यदि कहीं ‘पीआईओ’ (PIO) की नियुक्ति न की गयी हो या पीआईओ ने प्रार्थना पत्र लेने से मना कर दिया हो तो शिकायकर्ता को आगे अपील करने के लिए पीआईओ के यहां दाखिल अपील की प्रति कैसे प्राप्त होगी।

निष्कर्षः- निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि  सूचना के अधिकार अधिनियम में  प्रस्तावित संशोधन इस अधिनियम को कमजोर करने वाले हैं। इन संशोधनों के स्थान पर सरकार को ऐसी व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए ताकि लोग बिना भय के सूचना के अधिकार का प्रयोग कर सकें।

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