मान लीजिए कि आपके निकट मित्रों में से एक, जो स्वयं सिविल सेवा में जाने के लिए प्रयत्नशील है, वह लोक-सेवा में नैतिक आचरण से सम्बन्धित कुछ मुद्दो पर चर्चा करने के लिए आपके पास आता है। वह निम्म्नलिखित बिन्दुओं को उठाता हैः a) आज के समय में, जब अनैतिक वातावरण काफी फैला हुआ है, नैतिक सिद्धांतों से चिपके रहने के व्यक्तिगत प्रयास, व्यक्ति के कैरियर में अनेक समस्याएँ पैदा कर सकते हैं। ये परिवार के सदस्यों पर कष्ट करने और साथ ही साथ स्वयं के जीवन पर जोखिम का कारण भी बन सकते हैं। हम क्यों न व्यावहारिक बनें और न्यूनतम प्रतिरोध के रास्ते का अनुसरण करें, और जितना अच्छा हम कर सकें,उसे ही करके प्रसन्न रहें? b) जब इतने अधिक लोग गलत साधनों को अपना रहे हैं और तंत्र को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं, तब क्या फर्क पड़ेगा यदि केवल कुछ एक लोग ही नैतिकता की चेष्टा करें? वे अप्रभावी ही रहेंगे और निश्चित रूप से अन्ततः निराश हो जाएंगे। c) यदि हम नैतिक सोच-विचार के बारे में अधिक बतंगड़ बनाएंगे, तों क्या इससे देश की आर्थिक उन्न्ति में रूकावट नहीं आएगी? असलियत में, उच्च प्रतिस्पर्धा के वर्तमान युग में, हम विकास की दौड़ में पीछे छूट जाने को सहन नहीं कर सकते। d) यह तो समझ आता है कि भारी अनैतिक तौर-तरीकों में हमें फंसना नहीं चाहिए, लेकिन छोटे-मोटे उपहारों को स्वीकार करना और छोटी-मोटी तरफदारियां करना सभी के अभिप्रेरण में वृद्धि कर देता है। यह तंत्र को और भी अधिक सुचारू बना देता है। ऐसे तौर-तरीकों को अपनाने में गलत क्या है? उपरोक्त दृष्टिकोणों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। इस विश्लेषण के आधार पर अपने मित्र को आपको क्या सलाह रहेगी?

लोकसेवा में नैतिक आचरण की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हेाती है क्योंकि लोकसेवकों को जनता के संदर्भ में निर्णय लेना हेाता है तथा यह निर्णय बहुत बड़ी संख्या में लोगों केा प्रभावित कर सकता है।

            उपरोक्त दृष्टिकोणों का समालोचनात्मक विश्लेषण निम्न प्रकार हैः-

  1. प्रथम दृष्टिकोण के समुचित विश्लेषण के लिए जरूरी है कि उसके विभिन्न पक्षों का समुचित आकलन किया जाये।

दरअसल नैतिकता से तात्पर्य समाज के द्वारा स्वीकृत मूल्यों एवं मापदण्डों का पालन करना है अतः नैतिकता का पालन जरूरी है। नैतिकता का मार्ग जीवन में प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है। इस कारण से यह कहना सही नहीं है कि नैतिकता  जीवन के लिए संकट उत्पन्न कर सकती है तथा प्रगति का मार्ग अवरुद्ध कर सकती है। हाँ यह सही है कि लोकसेवक को काफी धैर्यपूर्वक, सहनशीलता से काम करना होता है अतः उसके लिए न्यूनतम प्रतिरोध का व्यवहारिक मार्ग अपनाना जरूरी है। अनेकों बार राजनीतिज्ञों तथा बाहुबली लोगों के दबाव में लोकसेवकों को गलत कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है, किंतु ऐसी परिस्थितियों में प्रतिकार के स्थान पर न्यूनतम प्रतिरोध का मार्ग ही उचित होगा अन्यथा स्थिति बिगड़ सकती है।

  1. यह सही है कि भ्रष्ट लोगों की संख्या काफी अधिक है तथा ईमानदार लोग काफी अल्प मात्र में है। किंतु इसका यह मतलब नहीं है कि सभी लोग भ्रष्ट हो जायें। एक सच्चा एवं ईमानदार व्यक्ति बहुत बड़ा परिवर्तन लाने में सक्षम है। किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘‘जब एक मोमबत्ती बुझ जाती है तो उजाले के स्थान पर अंधेरा हो जाता है।’’ कहने का तात्पर्य यह है कि नैतिकता एवं ईमानदारी का मार्ग ही उचित है अतः इस पर पूर्णतः अडिग रहने की आवश्यकता है।
  2. अनैतिक रास्ते को अपनाकर कोई भी व्यक्ति क्षणिक प्रगति ही कर सकता है, किंतु इससे उसका दीर्घकालिक एवं स्थायी विकास अवरुद्ध हो जायेगा। हो सकता है कि नैतिकता एवं सच्चाई से थोड़ी समस्यायें आ जायें किंतु ये समस्यायें अधिक समय तक टिक नहीं सकती है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि सत्य का मार्ग काफी दुर्गम और पथरीला जरूर है किंतु अंततः विजय सत्य की ही होगी।
  3. छोटे प्रलोभन कब बड़ी आवश्यकता में परिवर्तित हो जायें इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। अतः प्रलोभन छोटा हो या बड़ा लोकसेवक के लिए गलत है। लोकसेवक को पूरी निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का निवर्हन करना चाहिए तथा आचरण संहिता में निर्धारित प्रावधानों का पालन करना चाहिए। इस प्रकार लोक सेवक को हर प्रकार के प्रलोभन से दूर रहकर ईमानदारीपूर्वक अपने दायित्वों का निर्वहन करना ही उचित है।

मित्र को मेरी सलाहः

            उपर्युक्त दृष्टिकोणों के समुचित विश्लेषण के पश्चात् मेरे द्वारा अपने मित्र को सलाह दी जायेगी कि वह सभी प्रकार की अफवाहों से दूर रहकर अपने कर्तव्यों का पूरी सत्यता एवं ईमानदारी से निर्वहन करे। एक सत्यनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदार लोकसेवक समाज एवं देश के हित में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। सबसे बढ़कर ऐसे अधिकारी ही एक ऐसा स्थान हासिल करते हैं जिसकी मिसाल युवा अधिकारियों एवं देश के युवाओं के समक्ष प्रस्तुत की जाती है।

Posted on by