हरित त्यौहार : मानव एवं पर्यावरण दोनों लिए उपयोगी

भारत को त्यौहारों का देश कहा जाता है। इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि भारत में विभिन्न धर्मो के लोग निवास करते हैं तथा इन विभिन्न धर्मानुयायी लोगों के अपने-अपने त्यौहार होते हैं। इन त्यौहारों के आयेाजन से जीवन की एकरसता समाप्त होती है तथा एक नयी उमंग एवं उत्साह का संचार होता है।

            वर्तमान में धारणीय अथवा सतत विकास पर जोर दिया जा रहा है। इस अवधरणा के तहत यह माना जाता है कि पर्यावरणीय संसाधनों का दोहन इस प्रकार से किया जाना चाहिए ताकि आनेवाली पीढ़ी के लिए भी संसाधन इसी प्रकार से उपलब्ध हो सकें जैसे कि वर्तमान पीढ़ी के लिए उपलब्ध हैं।

            इस धारणीय विकास के मार्ग पर अग्रसर होने के सम्बंध में मानव समुदाय की बहुत बड़ी भूमिका होती है। इसका कारण यह है कि मानव समुदाय का प्रत्येक क्रियाकलाप पर्यावरण को प्रभावित करता है।

            त्यौहारों को भी मानवीय क्रियाकलापों के तहत शामिल किया जाता है। यदि  इन त्यौहारों को हरित अवधरणा के तहत आयोजित किया जाये तो निश्चित तौर पर पर्यावरण को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है।

            हिन्दू समुदाय में दीपावली, होली, मुस्लिम समुदाय में ईद, बकरीद, पारसियों में नवरोज, ईसाइयों में क्रिसमस, नववर्ष तथा सिक्खों में बैसाखी आदि महत्वपूर्ण पर्व आयोजित किये जाते हैं।

            किंतु शायद ही कोई समुदाय त्यौहारों के आयोजन के समय पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखता है। उदाहरण के तौर पर दीपावली में चीन की बनी विशाल रंग-बिरंगी झालरों का प्रयोग किया जाता है। इन झालरों के प्रयोग से भारी मात्र में विद्युत की खपत होती है। साथ ही प्रकाश प्रदूषण (रात्रि चमक में वृद्धि) में भी वृद्धि होती है। सबसे बढ़कर झालरों की अत्यधिक माँग के कारण मिटृटी के दिए बनाने वाले कुम्हार बेरोजगार हो रहे हैं।

            इसी प्रकार दीपावली के दौरान भारी मात्र में पटाखों का इस्तेमाल किया जाता है। इन पटाखों के कारण न सिर्फ ध्वनि प्रदूषण होता है बल्कि वायु प्रदूषण को भी बढ़ावा मिलता है।

            दीपावली के समान होली जैसे त्यौहार के समय भी ऐसे आयोजन को महत्त्व दिया जाता है जो पर्यावरण के लिए हानिकारक होता है। होली के दौरान भारी मात्र में सिंथेटिक एवं केमिकल रंगों का प्रयोग किया जाता है जो मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी हानिकारक होते हैं।

            हिंदू समुदाय के अलावा अन्य समुदायों के त्यौहारों की बात की जाये तो लगभग ऐसी ही स्थितियां सामने आती है। मसलन जानवरों की हत्या, अत्यधिक ध्वनि एवं प्रकाश प्रदूषण तथा अन्य कई प्रकार पर्यावरण अहितैषी कदमों को उठाया जाता है। इन कदमों से मानव समुदाय के साथ-साथ पर्यावरण को भी गंभीर क्षति पहुंचती है।

            यही कारण है कि कुछ पर्यावरणविदों ने हाल ही में हरित त्यौहारों की अवधरणा सामने रखी है। हरित त्यौहारों की अवधारणा त्यौहारों के इस प्रकार से आयेाजन पर आधारित है ताकि मानव समुदाय एवं पर्यावरण को किसी प्रकार की हानि न हो।

            दीपावली के दौरान मिट्टी के बने दीपों का प्रयोग किया जा सकता है। ज्ञातव्य है कि मिट्टी के दीपक पर्यावरण के लिए लाभदायक होते हैं, साथ ही मानव स्वास्थ्य के लिए भी कई प्रकार से लाभदायक होते हैं। वैज्ञानिकों के द्वारा यह बात सिद्ध की जा चुकी है कि मिट्टी के दीपक में जब सरसों का तेल आदि डालकर जलाया जाता है तो उससे घरों की सीलन दूर होती है तथा विषैले कीट-पतंगे समाप्त होते हैं।

            सबसे बढ़कर दीपावली प्रकाश पर्व है अतः हमें घरों मे रोशनी फैलाने के साथ-साथ गरीबों के जीवन में भी खुशी लाने का कार्य करना हेागा। जितना व्यय हम महंगे पटाखों पर करते हैं उतने से हम किसी गरीब परिवार की मदद कर सकते  हैं ताकि वह भी दीपावली का त्यौहार मना सके।

इसी प्रकार के कदम हम होली के दौरान भी उठा सकते हैं। होली के दौरान सिंथेटिक एवं रासायनिक रंगों के स्थान पर फूलों से तैयार किये गये प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जा सकता है। ज्ञातव्य है कि मथुरा में टेसू के फूलों से बने रंग का इस्तेमाल होली के दौरान किया जाता है। यह मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी लाभकारी हो सकता है।

            ईद, बकरीद, क्रिसमस, नववर्ष, नवरोज, वैशाली आदि त्यौहारों के दौरान भी हम ऐसे कदम अपना सकते हैं जिससे मानव स्वज्ञसथ्य के साथ-साथ पर्यावरण का भी हित हो।

            सबसे बढ़कर भारत में प्राचीन काल से ही पर्यावरण को संरक्षित रखने की परम्परा रही है। उदाहरण के तौर पर सिंधु घाटी के समय से ही वृक्षों को देवता के रूप में मान्यता प्रदान की जाती है। आज के समय में भी पीपल जैसे वृक्षों में भगवान का निवास माना जाता है और इनके संरक्षण के लिए कदम उठाये जाते हैं।

            इसी प्रकार नदियों को माता का दर्जा दिया जाता है। गंगा, यमुना एवं अन्य नदियों को न सिर्फ जीवनदायिनी माना जाता है बल्कि इन्हें देवी, माता जैसे नामों से भी अभिहित किया जाता है।

            इस प्रकार निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि धारणीय विकास में हरित त्यौहारों की बड़ी भूमिका हो सकती है। यदि सभी वर्ग, समुदाय एवं धर्मावलंबी धारणीय विकास के प्रति संवेदनशील बने तो निश्चित तौर पर हरित त्यौहारों के आयोजन को सम्भव बनाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि यदि सतत् विकास के मार्ग पर अग्रसर होना है तो मानव समुदाय को यह बात स्पष्टतः समझनी होगी कि उन्हें स्वयं पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाना है। महज सरकारी प्रयासों से यह सम्भव नहीं होगा। दैनिक जीवन से सम्बंधित क्रियाकलापों के साथ-साथ विशेष अवसरों पर आयोजित समारोंहों, पर्व, त्यौहारों आदि के दौरान हमें ऐसे कदम उठाने होंगे जो पर्यावरण हितैषी है। यदि हम ऐसा कर सके तो निश्चित तौर पर आने वाली पीढ़ी को भी वैसा ही पर्यावरण दे सकेंगे जैसा कि वर्तमान पीढ़ी के लिए उपलब्ध है।

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