आरक्षणः उद्देश्य, समस्याएँ एवं समाधानः

आरक्षण से तात्पर्य एक ऐसी व्यवस्था से हैं जिसके तहत समाज के सशक्त वर्गों की तुलना में समाज के वंचित, पिछड़े एवं संवेदनशीलता वर्गों को कुछ विशेष सुविधायें प्रदान की जाती है ताकि ये वर्ग भी समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें।

            भारत में आरक्षण की शुरुआत सर्वप्रथम वर्ष 1895 में हुयी। वर्ष 1895 में मैसूर राज्य के द्वारा मिलर कमीशन का गठन किया गया। इस कमीशन की सिफारिश पर सरकारी नौकरियों में कुछ पद पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित किये गये थे। इसके पश्चात् वर्ष 1921 में मद्रास प्रेसीडेन्सी के द्वारा आरक्षण की व्यवस्था को शुरू किया गया।

            डॉ॰ अम्बेडकर जो स्वयं दलित महार जाति से सम्बंधित थे, पहले ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व थे, जिन्हानें दलितों एवं वंचितों के लिए आरक्षण की माँग की। स्वतंत्रता के पश्चात् जब भारत का संविधान लागू हुआ तो पिछड़े वर्गों के साथ-साथ अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी।  भारतीय संविधन के अनुच्छेद  16(4) A में सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी। इसी प्रकार 16 (4) (A) में पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था की गयी।

1950 में लागू किये गये भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियो के लिए 12.5 प्रतिशत तथा अनुसूचित जनजाति के लिए 5.0 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गयी। आगे वर्ष 1960 में आरक्षण की यह सीमा बढ़कर 15 प्रतिशत तथा 7.5 प्रतिशत कर दी गयी। अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए शुरु में आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी।

अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण  देने के सम्बंध में विचार करने के लिए 1953 में काका कालेलकर आयोग का गठन किया गया। काका कालेलकर आयोग को प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग के नाम से भी जाना जाता है। इसकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया।

आगे मोरार जी देसाई के प्रधानमंत्रित्व काल में वर्ष 1970 में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया। बी.पी. मण्डल की अध्यक्षता में गठित इस द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयेाग को मण्डल आयोग के नाम से भी जाना जाता है। मण्डल आयोग की सिफारिशों को वर्ष 1990 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रतापसिंह के द्वारा लागू कर दिया गया।

मंडल आयेाग की सिफारिशों के लागू होने के पश्चात् अन्य पिछड़ा वर्गों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त हो गया। आगे क्रीमीलेयर की व्यवस्था लागू की गयी जिसके तहत एक निश्चित आय सीमा में आने वाले अन्य पिछड़ा वर्गों को आरक्षण से बाहर रखा गया।

किंतु यहां एक बड़ा प्रश्न यह उपस्थित होता है कि क्या आरक्षण अपने उद्देश्य में सफल हो पाया है। वस्तुतः आरक्षण का उद्देश्य समाज के वंचित एवं उपेक्षित वर्गों को सशक्त बनाकर समाज की मुख्य धारा में शामिल करना था लेकिन आरक्षण अपने उद्देश्य को पूरा करने में बहुत कम ही सफल रहा है।

अनुसूचित जातियों का एक छोटा सा वर्ग ही आरक्षण से लाभान्वित हो पाया है। अनुसूचित जातियों का बड़ा  हिस्सा आज भी वंचित है तथा मूलभूत सुविधाओं के बिना जीवन जीने को अभिशप्त है।

इसी प्रकार अनुसूचित जनजातियों की स्थिति तो और भी खराब है। कोल, मील, मुण्डा, सहरिया, शैम्पेन, जारवा आदि जनजातियां अपने सदियों पुराने आदिम समाज में ही रह रही हैं। इन्हें शायद ही आरक्षण की व्यवस्था से कोई विशेष लाभ हुआ है। आज भी इनके लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षित सीटें खाली ही रह जाती हैं।

अन्य पिछड़ा वर्ग की बात करें तो स्पष्ट हो जाता है कि आरक्षण का लाभ सर्वाधिक इसी वर्ग के द्वारा उठाया गया है। कुछ ऐसी जातियां है जो आर्थिक एवं सामाजिक रूप से काफी सशक्त हैं किंतु फिर भी अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल होकर आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रही हैं।

उदाहरण के तौर पर दिल्ली एवं राजस्थान जैसे राज्यों में जाटों की आर्थिक, समाजिक स्थिति काफी सशक्त है फिर भी इन दोनों राज्यों में जाट अन्य पिछड़ा वर्ग में आते हैं और आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। इसी प्रकार को स्थिति उत्तर प्रदेश के यादवों, गुजरात के पटेलों तथा राजस्थान के गुर्जरों के सम्बंध में विद्यमान है। ये जातियां आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त होने के बावजूद आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रही हैं।

इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि आरक्षण को जिस उद्देश्य से लागू किया गया था वह उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया है। ऐसी स्थिति में महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि आरक्षण की समुचित व्यवस्था क्या हो सकती है। इसके लिए निम्न प्रश्नों पर विचार किया जाना जरूरी है।

देश में आरक्षण को सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर लागू किया गया है। इसके कारण वे लोग आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाते हैं जिनकी सामाजिक स्थिति तो ठीक है किंतु  आर्थिक रूप से काफी कमजोर हैं। इन लोगों को सिर्फ इसलिए आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता क्योंकि ये सामान्य वर्ग से सम्बंधित हैं।

दूसरी ओर यदि आरक्षण को आर्थिक आधार पर भी लागू कर दिया जाता है तो आरक्षण पाने वालों की संख्या काफी बढ़ जायेगी। इससे आरक्षण के वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करने में समस्या आ सकती है, क्योंकि भारतीय समाज में उच्च वर्ग में शामिल जातियों को समाज में हमेशा उच्च स्थान प्रदान किया जाता रहा है। जबकि निम्न जातियों की आर्थिक स्थिति कुछ मजबूत होने के बावजूद उन्हें समाज में कभी सम्मान नहीं दिया गया। दूसरे शब्दों में आरक्षण की सर्वाधिक जरूरत निम्न जातियों को है न कि उच्च जातियों को।

किंतु यह मार्ग भी एकतरफा ही प्रतीत हो रहा है। अतः जरूरत एक ऐसे मार्ग को अपनाने की है ताकि आरक्षण का लाभ सर्वाधिक जरूरतमंदों को ही प्राप्त हो। इसके लिए हमें आर्थिक एवं सामाजिक दोनों ही आधार पर आरक्षण की व्यवस्था लागू करनी होगी।

आर्थिक एवं सामाजिक दोनों आधार पर आरक्षण की व्यवस्था सामान्य वर्ग एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के सम्बंध में ही लागू करनी होगी क्योंकि अनुसूचित जातियां एवं अनुसूचित जनजातियां पहले से ही पिछड़ी हुयी हैं। इनके लिए आरक्षण को जारी रखना ही उचित होगा।

जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग में से उन लेागों को आरक्षण का लाभ लेने से रोकना होगा जिनकी आर्थिक, सामाजिक स्थिति सशक्त है। उदाहरण के तौर पर जाटों, गुर्जरों, यादवों, पटेलों आदि को आरक्षण की व्यवस्था से अलग करना होगा। इस संबंध व्यवसाय, नौकरी आदि जैसे मानक निर्धारित किये जा सकते हैं। सामान्य वग में से उन लेागों को आरक्षण के लिए चुना जा सकता है जिनकी आर्थिक स्थिति काफी कमजोर है और वे गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में आते हैं। ऐसे सवर्ण गरीबों को भी आगे बढ़ने का अधिकार दिया जाना चाहिए।

इस प्रकार निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आरक्षण को समाप्त करने के स्थान पर इसे समावेशी बनाने की जरूरत है ताकि समाज के प्रत्येक वंचित वर्ग को आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त हो सके। सबसे बढ़कर इस सम्बंध में देश के राजनीतिक दलों को निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर निष्पक्ष तरीके से निर्णय लेना होगा।

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