विश्व में दो प्रकार की शक्तियां विद्यमान हैं। एक शक्ति सृजन से सम्बंधित है वहीं दूसरी शक्ति विधवंस से। साहित्य को सृजनात्मक शक्ति के अंतर्गत शामिल किया जाता है। वस्तुतः साहित्य कवि एवं लेखक की अभिव्यक्ति है जिसके माध्यम से वह समाज एवं उसमें शामिल लोगों का एक चित्रण प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि साहित्य को समाज का दर्पण माना जाता है।
भारत में लिखित साहित्य की बात करें तो सर्वप्रथम वैदिक साहित्य का नाम आता है। वैदिक साहित्य में वैदिक कालीन लोगों के सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन का उल्लेख मिलता है। उपनिषदों की रचना उत्तरवैदिक काल में हुयी। इन उपनिषदों को ज्ञान का अद्भुत स्त्रोत माना जाता है। जर्मनी के शॉपेनहावर तथा भारत के स्वामी विवेकानंद उपनिषदों की खुले मन से प्रशंसा करते हैं। शापेनहावर तो यहां तक कहते हैं कि इन उपनिषदों ने मुझे जीते जी शांति प्रदान की है तथा मरने के बाद भी ये मुझे शांति प्रदान करते रहेंगे।
वेदों, उपनिषदों के पश्चात् महाकाव्य साहित्य एवं पुराणों का स्थान आता है। महाकाव्यों में रामायण एवं महाभारत उल्लेखनीय है। इन महाकाव्यों से तत्कालीन समाज एवं राजनीति का अद्भुत चित्रण प्राप्त होता है।
रामायण से पता चलता है कि एक आदर्श परिवार व्यवस्था में पुत्र को पिता, छोटे भाई को बड़े भाई तथा पत्नी को पति की आज्ञा का पालन करना हेाता है। इसी प्रकार महाभारत से पता चलता है कि सत्ता स्वजनों के प्राणों से भी बड़ी होती है।
इसी प्रकार पुराणों में एक प्रकार से विभिन्न राजवंशों का इतिहास लिखा मिलता है। पुराणों की संज्ञा 18 हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि इस साहित्य ने न सिर्फ तत्कालीन समाज एवं राजनीति का चित्रण प्रस्तुत किया है बल्कि समाज एवं राजनीति को एक स्वरूप प्रदान करने में आज तक अप्रत्यक्ष भूमिका अदा कर रहे हैं।
महाभारत के अंश के रूप में भगवद्गीता ग्रन्थ की रचना हुयी। आज भी इस ग्रंथ को कर्मयोगी लोगों के द्वारा बड़े चाव से पढ़ा जाता है तथा प्रेरणा ली जाती हैं।
प्राचीन भारत के साहित्य में पाणिनि, कात्यायन, कालिदास, अमरदास, मनु आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पाणिनि का व्याकरण आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि प्राचीनकाल में था। कालिदास को तो उनकी कृतियों के लिए साहित्य का रत्नमाना जाता है। इसी प्रकार मनु के द्वारा रचित मनुस्मृति तत्कालीन समाज के लिए एक विधि संहिता का कार्य करती थी।
प्राचीन भारत की दहलीज को छोड़कर जब हम राजपूत काल से होते हुए सल्तनतकाल में प्रवेश करते हैं तो हमारा सामना वीरगाथाकाव्य, अरबी साहित्य एवं फारसी साहित्य से होता है। इन साहित्यों में भी हमें तत्कालीन समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति का चित्रण प्राप्त होता है।
मध्यकालीन साहित्य ने समाज को गहराई से प्रभावित किया। इस काल में कबीर, नानक, तुलसीदास, चैतन्य, सूरदास, तुकाराम, नामदेव जैसे कवि एवं साहित्यकार उत्पन्न हुए। इन्होंने न सिर्फ तत्कालीन सामाजिक बुराईयों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया बल्कि हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा सबसे बढ़कर निम्न जातियों के उद्धार के लिए सुदृढ़ आधारभूमि निर्मित की।
आधुनिककालीन साहित्य में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मुंशी प्रेमचन्द्र, निराला, जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय, राहुल सांस्कृत्यायन, मुक्तिबोध का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने समाज को गहराई से प्रभावित किया है।
सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में इंटरनेट के आगमन एवं सोशल मीडिया के प्रचार-प्रसार से यद्यपि किताबों के प्रति आकर्षण थोड़ा कम हुआ है, किंतु समाज को प्रभावित करने की साहित्य की भूमिका बनी हुयी है।
साहित्यकारों के द्वारा समाज के प्रत्येक पहलू मसलन वर्ण व्यवस्था, कृषक समाज, औद्योगिक वर्ग, महिलाओं की दशा, निम्न वर्ग की स्थिति, परिवार के स्वरूप तथा राजनीतिक एवं प्रशासनिक क्षेत्र में लेखनी चलायी गयी। यही कारण है कि इन साहित्यकारों के द्वारा समाज के मूल्यों को गहराई से प्रभावित किया गया।
दरअसल, साहित्य का सृजन जिस काल में किया जाता है वह उसी काल का चित्रण प्रस्तुत करता है। उदाहरण के तौर पर वैदिककालीन साहित्य वैदिककाल का, मौर्यकालीन साहित्य सल्तनतकाल एवं मुगलकाल का तथा आधुनिककाल साहित्य समकालीन भारत का चित्रण प्रस्तुत करता है। इसी कारण से साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है।
साहित्य ने सिर्फ भारतीय समाज को ही प्रभावित नहीं किया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी साहित्य ने समाज को प्रभावित करने तथा उसे एक स्वरूप प्रदान करने में अहम भूमिका अदा की है।
प्राचीन यूनान में महाकवि होमर का इलियड एवं ओडिसी यूनानी जनजीवन को आधार प्रदान करता है। सोफोकोलीज, एरिस्तोफेनीज, वर्जिल, होरेस जैसे यूनानी रोमन साहित्यकारों ने समृद्ध यूनानी रोमन सभ्यता को सशक्त आधार प्रदान किया।
इसी प्रकार अंग्रेजी भाषा के साहित्यकारों ने भी समाज को स्वरूप प्रदान करने में अहम भूमिका अदा की। विलियम शेक्सपियर, वड्सवर्थ, जॉन मिल्टन, पी.वी. शैली आदि कवियों एवं साहित्यकारों ने अपने समृद्ध साहित्य से न सिर्फ तत्कालीन समाज के लिए योगदान दिया बल्कि इनका साहित्य आज भी लोगों को नये विचारों के सृजन की ओर ले जाता है।
यूरोप में रूसी, वाल्तेयर, दांते तथा चीन में काकाओ, जीकांग एवं रूस में तुर्गनेव, टालस्टाय, दोस्तोवस्की जैसे रचनाकारों ने अपनी रचनाओं से समाज को ढालने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
इस प्रकार निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि साहित्यकार उस शिल्पी की भांति है जो अपनी रचनाओं से समाज को स्वरूप प्रदान करता है। यह समाज की कमियों को लोगों के समक्ष उठाता है ताकि लोग उसे पढ़कर विषमताओं एवं कमियों के विरुद्ध एकजुट हो सकें। सबसे बढ़कर एक साहित्यकार को निष्पक्ष होना जरूरी है ताकि उसके द्वारा बिना किसी पूर्वाग्रह के वास्तविकता को सामने लाया जा सके और समाज को वांछित स्वरूप में ढाला जा सके।