हाल ही में सर्वोच्च न्यायलय ने एक निर्णय में इस तथ्य को मजबूती से रखा है कि दिव्यांग लोगों के लिए सिर्फ कानून बना देने से उनकी समस्या का हल नहीं होगा? दिव्यांगों की स्थिति में सुधार के लिए व्यवहारिक स्तर पर कार्य भी करने होंगे। साथ ही बताइए कि दिव्यांगों को बेहतर ढंग से लाभान्वित करने के लिए किस प्रकार के कदम उठाने की जरूरत है?

 हाल ही में सर्वोच्च न्यायलय ने दिव्यांगों की खराब स्थिति पर चिंता व्यक्त की है तथा स्पष्ट किया है कि मात्र कानूनों के निर्माण से दिव्यांगों की स्थिति में सुधार नहीं लाया जा सकता है। इनकी स्थिति में सुधार के लिए जमीनी स्तर पर कार्य भी करने होंगे।

उल्लेखनीय है कि भारत संयुक्त राष्ट्र के ऑफ पर्सनल विद डिसएविलिटिज (Rights Persons With Dissabilities) नामक कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता है अतः उसके लिए यह जरूरी है कि वह दिव्यांगों की स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाये तथा एक सशक्त कानून का निर्माण करे।

भारत सरकार ने इस कर्तव्य को गंभीरतापूर्वक समझा है तथा दिव्यांगों के लिए एक कानून का निर्माण भी किया है। किंतु भारत में इस कानून के व्यवहारिक क्रियान्वयन को सफल बनाना जरूरी है। सर्वोच्च न्यायालय की चिंता भी इसी ओर इंगित करती है।

दिव्यांगों को बेहतर ढंग से लाभान्वित करने के लिए उठाये जाने वाले कदमः

  • कानून  के व्यवहारिक क्रियान्वयन के लिए जरूरी है कि लोगों की मानसिकता में परिवर्तन लाया जाये। बिना मानसिकता में परिवर्तन लाये दिव्यांगों की स्थिति में समुचित सुधार लाना कठिन होगा।
  • सुगम्य भारत अभियान को केन्द्र एवं राज्य सरकारों के सहयोग से पूरे  उत्साह के साथ लागू किया जाना जरूरी है। इसमें स्थानीय सरकारों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इस प्रकार के समन्वित प्रयासों से ही देश के प्रत्येक हिस्से को दिव्यांगों के अनुकूल बनाया जा सकता है।
  • आरबीआई के निर्देशों के अनुसार दिव्यांगों को अन्य लोगों के समान ही बैंकिंग की सुविधायें दी जानी चाहिए किंतु अधिकांश बैंक इन निर्देशों का पालन नहीं करते हैं तथा विभेदात्मक व्यवहार करते हैं। निर्देशों का पालन न करने वाले बैंकों को दण्डित किया जाना चाहिए।
  • समाज में दिव्यांगों के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए ताकि उन्हें यह एहसास हो सके कि वे भी समाज के अभिन्न अंग हैं।
  • समाज में दिव्यांगों के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए ताकि उन्हें यह एहसास हो सके कि वे भी समाज के अभिन्न अंग हैं।
  • कानूनों का निर्माण एवं क्रियान्वयन इस प्रकार से होना चाहिए ताकि दिव्यांगों को एक समुचित प्लेटफार्म मिल सके जिसमें से अपनी क्षमताओं का विकास कर सकें।

निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि दिव्यांगों की स्थिति में सुधार के लिए कानूनों के निर्माण के साथ उनके व्यवहारिक क्रियान्वयन की भी व्यवस्था को जानी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय इसी मत की अभिव्यक्ति है।

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