हाल में सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने सार्वजनिक तौर पर प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन कर मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ टिप्पणी की। इन जजों ने कह कि सर्वोच्च न्यायपालिका में सब कुछ ठीक नहीं है। यदि स्थिति में परिवर्तन नहीं लाया गया तो सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ लोकतंत्र के लिए भी खतरा उत्पन्न हो सकता है।
उल्लेखनीय है कि देश के इतिहास में पहले कभी भी ऐसी स्थिति नहीं उत्पन्न हुयी है। सर्वोच्च न्यायालय ऐसी संस्था है जिस पर देश के नागरिकों को गहरा विश्वास है अतः इस संस्था पर प्रश्न-चिन्ह लगने से पूरे देश के नागरिकों का विश्वास कमजोर हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के ऊपर कार्य का अतिरिक्त दबाव भी है क्योंकि कुल स्वीकृत 31 पदों में से सर्वोच्च न्यायालय में फिलहाल 25 न्यायाधीश ही हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के बीच उत्पन्न मतभेद के प्रमुख कारणः
- जिन चार वरिष्ठ नयायाधीशों के द्वारा सार्वजनिक रुप से प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया गया उनका आराप है कि मुख्य न्यायाधीश केस बँटवारे में मनमानी करा रहे हैं तथा अपनी पसंद की पीठों के पास ही मामले भेज रहे हैं।
- परम्परा के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश प्रशासनिक मुखिया होते हैं तथा विषयवार रोष्टर निर्मित करके सम्बंधित मामलों को इस मामले से सम्बंधित पीठों के पास भेजा जाता है। उपर्युक्त चारों न्यायाधीशों का मानना है कि मुख्य न्यायाधीश इस परम्परा का पालन नहीं कर रहे हैं।
- चारों न्यायाधीशों के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जो नहीं होना चाहिए था। हालाँकि इन न्यायाधीशों ने यह नहीं बताया कि क्या नहीं होना चाहिए।
- न्यायाधीशों के अनुसार मुख्य न्यायाधीश बराबर के जजों में प्रथम होते हैं न कि उनसे कम या अधिक जबकि मुख्य न्यायाधीश ऐसा व्यवहार कर रहें हैं जैसे वे ही श्रेष्ठ हैं।
इस प्रकार के मतभेदों का समाधानः
- सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों के द्वारा मुख्य न्यायाधीश के ऊपर जो आरोप लगाये गये हैं वे गंभीर हैं किंतु इन आरोपों के कारण मुख्य न्यायाधीश पर कोई प्रशासनिक कार्यवाही नहीं की जा सकती है क्योंकि मुख्य न्यायाधीश को सिर्फ महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है।
- चूँकि इस मामले में दखल के लिए सरकार से भी अपेक्षा नहीं की जा सकती है अतः सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा को देखते हुए यह यही उचित होगा कि मुख्य न्यायाधीश स्वयं पहल करें और सभी न्यायाधीश आपस में मिलकर पारदर्शी समाधान निकालने का प्रयास करें।
निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के बीच उत्पन्न मतभेद चिंता का विषय है लोकतंत्र की रक्षा तथा न्यायपालिका में नागरिकों के विश्वास को बनाये रखने के लिए इस मतभेद का शीघ्रतिशीघ्र निराकरण किया जाना जरुरी है।