त्रिपल तलाक विधेयक को सामाजिक न्याय की स्थापना की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है, स्पष्ट कीजिए। इस विधेयक को पारित कराने में कार्यपालिका एवं विधायिका के साथ न्यायपालिका के मध्य एक बेहतर समन्वय एवं सामंजस्य देखने को मिला है, सविस्तार उल्लेख कीजिए।

त्रिपल तलाक अथवा तलाक-ए-बिद्दत एक ऐसी सामाजिक बुराई थी जिसका खामियाजा मुस्लिम वर्ग की महिलाओं को भुगतना पड़ता था। त्रिपल तलाक को सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा अवैध घोषित किये जाने से मुस्लिम महिलाओं को न सिर्फ राहत मिली है बल्कि समाज मे उनकी स्थिति को सशक्त बनाने का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है। इस सम्बंध में सरकार के द्वारा भी संवेदनशीलता बरती गयी और शीघ्रता से त्रिपल तलाक विधेयक को लोकसभा से पारित करा दिया गया। फिलहाल यह विधेयक राज्यसभा में लंबित है।

त्रिपल तलाक के सम्बंध में कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका के मध्य बेहतर समन्वयः

  • त्रिपल तलाक अथवा तलाक-ए-बिद्दत के प्रति आम जनता के मन में पहले से ही आक्रोश व्याप्त था क्योंकि यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं को कई प्रकार से हानि पहुँचाती थी। निवर्तमान सरकार ने जनता की इस माँग के प्रति प्रारम्भ से ही सहानुभूति प्रदर्शित की थी।
  • इसके पश्चात सर्वोच्च न्यायालय ने प्रगतिशील फैसला सुनाते हुए अगस्त 2017 में त्रिपल तलाक अथवा तलाक-ए-बिद्दत को अवैध घोषित कर दिया।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने सिर्फ त्रिपल तलाक को अवैध ही नहीं घोषित किया बल्कि इस सम्बंध में शीघ्रतिशीघ्र कानून बनाने के लिए केन्द्र सरकार को निर्देश भी जारी किया।
  • सरकार के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को गंभीरतापूर्वक लिया गया तथा त्रिपल तलाक को अवैध बनाने एवं मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक विधेयक प्रस्तुत किया।
  • केन्द्र सरकार के द्वारा प्रस्तुत किये गये इस विधेयक का नाम मुस्लिम महिलायें (विवाह के सम्बंध में अधिकारों का संरक्षण) (Muslim Women Protection  of rights on marriage) था। केन्द्र सरकार के द्वारा प्रस्तुत इस विधेयक को लोकसभा के द्वारा पारित भी किया जा चुका है जबकि विपक्षी दलों के विरोध के कारण यह विधेयक राज्य सभा से पारित नहीं हो सका है। अब इसे आगामी बजट सत्र में पारित किये जाने की पूरी सम्भावना है।

निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि त्रिपल तलाक विधेयक मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक न्याय उपलब्ध करवाने के प्रति प्रतिबद्ध है। इस विधेयक को पारित कराने में न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका के मध्य बेहतर तालमेल एवं समन्वय देखने को मिला है।

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