क्या सांसदों एवं विधायकों जैसे जनप्रतिनिधियों को वकालत करने की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए? इस सम्बंध में प्रस्तुत किये जाने वाले तर्कों का सविस्तार उल्लेख कीजिए। पक्ष एवं विपक्ष में दिए गये तर्कों के समुचित आकलन के बाद अपना मत प्रस्तुत कीजिए।

देश में कई ऐसे सांसद एवं विधायक हैं जो कानून का व्यवसाय करते हैं। चूँकि लाभ का पद चर्चा में है अतः यह चर्चा भी स्वाभाविक हो जाती है कि क्या सांसदों एवं विधायकों को वकालत करने से रोंका जाना चाहिए। इस सम्बंध में सही निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए इसके पक्ष एवं विपक्ष दोनों के तर्कों का समुचित आकलन करना होगा।

सांसदो एवं विधायकों को वकालत की अनुमति देने के पक्ष में तर्कः

  • यदि सांसदों एवं विधायकों को वकालत करने की अनुमति प्रदान की जाती है तो इससे सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि विधायिका में कुशल लोग प्रवेश पा सकेंगे।
  • वकालत करने वाले जनप्रतिनिधियों में कानून की बेहतर समझ होगी जिससे विधायिका में कानूनों के निर्माण के समय उनकी विशेषज्ञता से लाभ उठाया जा सकेगा।
  • भारतीय संविधान में व्यवसाय करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। यदि जनप्रतिनिधियों को वकालत करने से प्रतिबंधित किया जाता है तो यह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
  • यदि भारत में सांसदो एवं विधायकों को वकालत करने से रोका जाता है तो यह एक प्रतिगामी कदम होगा। ज्ञातव्य है कि दुनिया के विभिन्न देश अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को विधायिका में शामिल कर रहे हैं। चूँकि सांसदों एवं विधायकों की नियुक्ति सरकार के द्वारा नहीं होती है अतः इन्हें सिविल सेवकों की तरह अन्य व्यवसाय करने से नहीं रोंका जाता है।
  • यह आशंका गलत है कि वकालत का व्यवसाय करने वाले सांसद एवं विधायक विधायिका में कॅारपोरेट जगत की लॉबी कर सकते हैं। ज्ञातव्य है कि संसद लॉबी करने का स्थान नहीं है और सबसे बढ़कर संसद अपने नियमों एवं कानूनों से संचालित होती है।

सांसदो एवं विधायकों को वकालत की अनुमति न देने के पक्ष में तर्कः

  • वकालत एक गंभीर पेशा है जिसमें काफी समय देने की जरुरत होती है। यदि जनप्रतिनिधि वकालत में अधिक समय देंगे तो विधायिका में उनकी उपस्थिति प्रभावित होगी।
  • यदि किसी वकील जनप्रतिनिधि ने किसी कम्पनी या कारपोरेट का मामला पैरवी के लिए ले रखा है तो वह इस मामले के सम्बंध में संसद या विधानसभा में लॉबिंग कर सकता है।
  • जनप्रतिनिधियों को पहले से ही कई प्रकार के भत्ते एवं वेतन प्रदान किये जा रहे हैं। यदि वे अन्य स्त्रोंतो से भी आय प्राप्त करते हैं तो यह अनैतिक होगा।
  • जनप्रतिनिधियों के द्वारा वकालत का पेशा अपनाना बार काउंसिल ऑफ इण्डिया के नियम 49 के भी विरुद्ध है। इसके तहत कोई भी फुलटाइम वेतन प्राप्त कर्मचारी न्यायालय में वकालत नहीं कर सकता है।

निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जनप्रतिनिधियों को पूरा ध्यान अपने कर्तव्यों को पूरा करने एवं उनको चुनने वाली जनता के हित में लगाना चाहिए न कि अन्य व्यवसाय से धन अर्जित करने में। सबसे बढ़कर इससे उनके ऊपर आम जनता का विश्वास और अधिक दृढ़ होगी।

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